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ग्राम सभा की अनदेखी और खनन का विस्तार: रायगढ़ के आदिवासी इलाकों में बढ़ता संघर्ष

छत्तीसगढ़ का रायगढ़ जिला एक आदिवासी बहुल क्षेत्र है, जहां कोयला खनन परियोजनाओं के बीच स्थानीय समुदाय अपने अस्तित्व, आजीविका और अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह संघर्ष केवल कोयला खनन तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्राम सभा के अधिकार, गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार और संविधान द्वारा दिए गए संरक्षण से भी जुड़ा हुआ है।
आदिवासी समुदायों के लिए जंगल और जमीन केवल आर्थिक संसाधन नहीं हैं, बल्कि उनकी संस्कृति, परंपरा और जीवन व्यवस्था का आधार हैं। ग्रामीणों का कहना है कि लगातार बढ़ती खनन परियोजनाओं से पर्यावरण, जैव विविधता और पारंपरिक जीवन पर गंभीर असर पड़ रहा है।

क्या है मामला

छत्तीसगढ़ के रायगढ़, कोरबा और सरगुजा जिलों में देश के बड़े कोयला भंडार मौजूद हैं। इन क्षेत्रों में लगभग 85 अरब टन कोयला भंडार होने का अनुमान लगाया जाता है। इस संसाधन के दोहन के लिए लगातार नई खनन परियोजनाएं प्रस्तावित की जा रही हैं।


रायगढ़ के तमनार क्षेत्र में भी कई कोयला परियोजनाएं संचालित और प्रस्तावित हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि भूमि अधिग्रहण और खनन प्रक्रिया में कई बार दबाव, प्रलोभन और कथित फर्जी ग्राम सभा जैसे तरीकों का इस्तेमाल किया गया। ग्रामीणों का कहना है कि ऐसी प्रक्रियाएं संविधान के स्वतंत्रता, न्याय, समानता और गरिमा जैसे मूल्यों को प्रभावित करती हैं।
यह पूरा क्षेत्र संविधान की पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आता है, जहां आदिवासी समुदायों की सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवस्था की सुरक्षा के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 यानी पेसा कानून के तहत ग्राम सभा को स्थानीय संसाधनों, जल, जंगल और जमीन से जुड़े निर्णयों में महत्वपूर्ण अधिकार दिए गए हैं।
कानून के अनुसार अनुसूचित क्षेत्रों में भूमि अधिग्रहण और संसाधनों से जुड़े फैसलों में ग्राम सभा की भूमिका जरूरी है। लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि कई मामलों में वास्तविक सहमति लिए बिना प्रक्रियाएं पूरी की जा रही हैं और फर्जी ग्राम सभा प्रस्तावों के आधार पर जनसुनवाई आयोजित की जा रही हैं।

लोकतंत्र और संवैधानिक मूल्यों का प्रश्न

 ग्रामीण इसे उनके संवैधानिक अधिकारों और व्यक्ति की गरिमा के उल्लंघन के रूप में देखते हैं।ग्रामीणों का कहना है कि विकास और खनन से जुड़े फैसले केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं हैं, बल्कि यह उन लोगों के जीवन से जुड़े निर्णय हैं जिनकी जमीन, जंगल और आजीविका सीधे प्रभावित होती है। यदि ऐसे निर्णय वास्तविक भागीदारी और सहमति के बिना लिए जाते हैं, तो यह संविधान की मूल भावना पर सवाल खड़ा करता है।

फर्जी ग्राम सभा या दबाव के माध्यम से किसी परियोजना को आगे बढ़ाना केवल एक कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्य ‘न्याय’ (Justice) के खिलाफ भी माना जा सकता है। न्याय का अर्थ केवल अदालतों तक सीमित नहीं है, बल्कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में प्रभावित लोगों को समान अवसर, सुनवाई और भागीदारी मिलना भी है।
आदिवासी क्षेत्रों में ग्राम सभा को अधिकार देने का उद्देश्य यही था कि स्थानीय समुदाय अपने जीवन, संसाधनों और भविष्य से जुड़े फैसलों में अपनी भूमिका निभा सकें। यदि ग्रामीणों की वास्तविक सहमति के बिना फैसले किए जाते हैं, तो यह संविधान द्वारा दिए गए स्वतंत्रता (Liberty) के मूल्य को प्रभावित करता है, क्योंकि लोगों को अपने जीवन और आजीविका से जुड़े विकल्प चुनने का अधिकार होना चाहिए।


वहीं, जब कमजोर और संसाधनों पर निर्भर समुदायों पर दबाव, विस्थापन या ऐसी नीतियां लागू होती हैं जिनमें उनकी आवाज कमजोर पड़ जाती है, तो इसका असर केवल आर्थिक स्थिति पर नहीं पड़ता, बल्कि उनकी व्यक्ति की गरिमा (Dignity) भी प्रभावित होती है। आदिवासी समुदायों के लिए जमीन और जंगल केवल संपत्ति नहीं, बल्कि उनकी पहचान, संस्कृति और जीवन का आधार हैं।


इसलिए खनन परियोजनाओं को लेकर विवाद केवल विकास बनाम पर्यावरण का प्रश्न नहीं है। यह इस मूल सवाल से भी जुड़ा है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में विकास की प्रक्रिया कितनी न्यायपूर्ण, सहभागी और संविधान के मूल्यों के अनुरूप है।

परियोजनाओं  से प्रभावित आदिवासी समुदायों के लिए विस्थापन केवल जमीन खोने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह उनके सामाजिक और आर्थिक जीवन को भी गहराई से प्रभावित करता है। कई मामलों में जब लोगों की जमीन और पारंपरिक आजीविका के साधन समाप्त होते हैं, तो वे रोजगार की तलाश में बड़े शहरों की ओर पलायन करने के लिए मजबूर हो जाते हैं।

रायगढ़ और आसपास के क्षेत्रों से विस्थापित या प्रभावित कई परिवारों के सदस्य निर्माण स्थलों, ईंट भट्टों और अस्थायी मजदूरी के कामों में लगे दिखाई देते हैं। महानगरों में वे अक्सर ऐसे काम करते हैं जहां उन्हें अस्थिर रोजगार, कम मजदूरी और सीमित सामाजिक सुरक्षा का सामना करना पड़ता है। ग्रामीण जीवन में जहां उनका संबंध अपनी जमीन, जंगल और समुदाय से था, वहीं शहरों में वे एक असुरक्षित श्रमिक वर्ग का हिस्सा बन जाते हैं।

यह स्थिति संविधान के समानता (Equality) के मूल्य पर भी सवाल खड़े करती है। समानता का अर्थ केवल कानून के सामने समान होना नहीं है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि कमजोर समुदायों को ऐसे अवसर और परिस्थितियां मिलें जहां वे सम्मान के साथ जीवन जी सकें। यदि विकास की प्रक्रिया का लाभ कुछ वर्गों तक सीमित रह जाए और प्रभावित समुदायों को विस्थापन, बेरोजगारी और असुरक्षित मजदूरी का सामना करना पड़े, तो समान अवसर का उद्देश्य कमजोर पड़ता है।

इसी तरह, जब आदिवासी समुदाय अपने पारंपरिक संसाधनों, सामाजिक संबंधों और जीवन पद्धति से अलग होकर केवल मजदूर के रूप में शहरों में जाने को मजबूर होते हैं, तो यह उनकी मानवीय गरिमा (Dignity) को प्रभावित करता है। गरिमा का मतलब केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि ऐसा जीवन है जिसमें व्यक्ति अपने निर्णय लेने, अपनी पहचान बनाए रखने और सम्मान के साथ आगे बढ़ने में सक्षम हो।

इसलिए विकास की किसी भी प्रक्रिया का मूल्यांकन केवल उत्पादन और आर्थिक लाभ के आधार पर नहीं किया जा सकता। संवैधानिक दृष्टि से वास्तविक विकास वही है जिसमें समानता, स्वतंत्रता, न्याय और गरिमा जैसे मूल्यों को साथ लेकर चला जाए.

और हाँ , जिस तरह से   सरकारी अधिकारी,कर्मचारी और पुलिस के अधिकारी  आदिवासियों से व्यवहार करते हैं, इससे  साफ़ झलकता है की इसमें बन्धुत्त्व  का पूरी तरह से अभाव है. 

तमनार क्षेत्र में बढ़ता खनन दबाव

हाल ही में अदानी और एसएससीएल की गारे खुली खदान परियोजना को लेकर नौ गांवों में जनसुनवाई प्रस्तावित की गई है। इस परियोजना के तहत लगभग 2077.934 हेक्टेयर भूमि पर खनन प्रस्तावित है, जिसमें लगभग 366 एकड़ वन भूमि शामिल है। प्रभावित गांवों में पेलमा, मड़वाडूमर, लालपुर और मूल्यूपारा प्रमुख हैं।


वहीं, धौराभाटा में जिंदल की गारे पेलमा सेक्टर-1 परियोजना को लेकर भी विरोध हुआ। इस परियोजना में लगभग 3020 हेक्टेयर क्षेत्र में खनन प्रस्तावित है।


तमनार ब्लॉक को कोयला खनन क्षेत्र के प्रमुख केंद्रों में गिना जाता है। यहां वर्तमान में कई ओपन कास्ट खदानें संचालित हैं, जबकि नई परियोजनाएं भी प्रस्तावित हैं। ग्रामीणों का कहना है कि खनन विस्तार से क्षेत्र के लगभग 52 गांव प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हो सकते हैं।

तमनार ब्लॉक ओपन कास्ट  खदान
तमनार ब्लॉक ओपन कास्ट खदान


ग्रामीणों के अनुसार वर्ष 2020 के बाद इस क्षेत्र में कई नई कमर्शियल कोल माइंस प्रस्तावित की गई हैं, जिससे भूमि, जंगल और स्थानीय जीवन पर दबाव लगातार बढ़ रहा है।
छत्तीसगढ़ के तमनार क्षेत्र के कई गांवों में प्रस्तावित और जारी कोयला खनन परियोजनाओं को लेकर ग्रामीणों में चिंता बढ़ रही है। ग्रामीणों का कहना है कि यह मुद्दा केवल रोजगार और विकास का नहीं, बल्कि संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों, ग्राम सभा की भूमिका, जल-जंगल-जमीन और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा हुआ है।


लालपुर गांव की ग्रामीण कोताबाई बताती हैं कि खनन परियोजना के समर्थन में माहौल बनाने के लिए कंपनी द्वारा गांव में सामान बांटे जा रहे हैं। उनका आरोप है कि जनसुनवाई को प्रभावित करने के लिए पेटी, डारी और क्रिकेट सामग्री जैसी चीजें वितरित की जा रही थी।

कोताबाई, ग्रामीण लालपुर
कोताबाई, ग्रामीण लालपुर


वहीं, जरीडीह गांव के दीपक बताते हैं कि जब ग्रामीणों को कोयला खनन के विरोध की जानकारी मिली, तब बड़ी संख्या में पुलिस बल गांव पहुंचा था। ग्रामीणों के अनुसार पुलिस ने उन्हें विरोध न करने की बात कही, जिससे कई लोग डर गए।


लालपुर के एक ग्रामीण, जो कंपनी में ठेका कर्मचारी के रूप में काम करते हैं, नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं कि जिन परिवारों की जमीन अधिग्रहित की जाती है, उन्हें नौकरी देने का वादा किया जाता है। लेकिन अधिकांश लोगों को स्थायी रोजगार नहीं मिलता, बल्कि ठेका व्यवस्था के तहत काम दिया जाता है।


वे कहते हैं, “अभी 12 से 18 हजार रुपये महीने की नौकरी मिल रही है, लेकिन महीने के अंत तक पेट्रोल के पैसे के लिए भी दूसरों से मदद मांगनी पड़ती है। खदान खत्म होने के बाद यह रोजगार भी खत्म हो जाएगा। अगर जमीन और जंगल बचेंगे तो खेती और वनोपज के सहारे जीवन चलता रहेगा।”


ग्रामीणों की चिंता केवल कम वेतन तक सीमित नहीं है। उनका कहना है कि जमीन जाने के बाद उनके पास आजीविका के सीमित विकल्प रह जाएंगे। जिन परिवारों के पास कम जमीन है या बिल्कुल जमीन नहीं है, उनके लिए खनन परियोजना के बाद जीवन और कठिन हो सकता है।रजगार के लिए फिर उन्हें  बड़े शहरों का रुख कर अपनी धरती से पलायन करना पड़ेगा। 

ग्राम सभा और संवैधानिक अधिकारों का सवाल

इंजर गांव के रामनाथ कहते हैं कि पहले जंगल से वनोपज मिलता था और जंगल की सुरक्षा से जुड़े कामों से भी आमदनी होती थी। उनका कहना है कि यदि गांव उजड़ता है तो केवल घर नहीं, बल्कि पूरी सामाजिक व्यवस्था प्रभावित होगी।


वे कहते हैं, “हमने ग्राम सभा से अनुमति नहीं दी। संभव है कि धोखे से हस्ताक्षर कराए गए हों। अनुसूचित क्षेत्रों में आदिवासी जमीन की सुरक्षा के लिए विशेष कानूनी प्रावधान हैं।”


भारत के संविधान की पांचवीं अनुसूची और पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 यानी पेसा कानून अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा को विशेष अधिकार देता है। पेसा कानून के अनुसार जल, जंगल, जमीन और स्थानीय संसाधनों से जुड़े निर्णयों में ग्राम सभा की भूमिका महत्वपूर्ण है।


कानून के अनुसार भूमि अधिग्रहण से पहले प्रभावित ग्राम सभा को परियोजना की जानकारी, उसके प्रभाव, पुनर्वास और आजीविका से जुड़े पहलुओं से अवगत कराया जाना चाहिए। खनन पट्टा और अन्य प्रक्रियाओं में भी ग्राम सभा की भागीदारी सुनिश्चित की गई है।


ग्रामीणों का आरोप है कि कई मामलों में इन संवैधानिक प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया और फर्जी ग्राम सभा प्रस्तावों के आधार पर आगे की कार्रवाई की गई।

नागरमुंडा में विस्थापन का विरोध

नागरमुंडा ऐसा पहला गांव बताया जा रहा है जहां ग्रामीणों को गांव खाली करने के लिए नोटिस दिया गया। ग्रामीणों के अनुसार वर्ष 2021 में ग्राम सभा आयोजित होने का दावा किया गया था, लेकिन उस समय के ग्राम सभा अध्यक्ष अंतन राम राठिया का कहना है कि ऐसी कोई बैठक नहीं हुई थी और उनके हस्ताक्षर का गलत इस्तेमाल किया गया।
ग्रामीणों के अनुसार वर्ष 2023 में गांव में नोटिस चिपकाया गया। नवंबर 2024 में जब कंपनी के लोग पेड़ काटने पहुंचे तो ग्रामीणों ने ग्राम सभा की अनुमति दिखाने की मांग की।
ग्रामीणों का आरोप है कि पंचायत स्तर पर प्रक्रिया पूरी किए बिना प्रस्ताव तैयार किए गए। इसके विरोध में ग्रामीण अधिकारियों के पास पहुंचे और पेड़ कटाई रुकवाने की मांग की।
धौराभाटा और गारे पेलमा परियोजना

तमनार क्षेत्र के धौराभाटा में गारे पेलमा सेक्टर-1 कोयला परियोजना को लेकर भी विरोध हुआ। ग्रामीणों के अनुसार हजारों लोगों ने इसका विरोध किया, लेकिन पुलिस सुरक्षा के बीच जनसुनवाई आयोजित कर दी गई। इस परियोजना से लगभग 14 गांव प्रभावित होने की बात कही जा रही है। प्रस्तावित क्षेत्र में लगभग 3020 हेक्टेयर जमीन पर खनन और प्रतिवर्ष 15 मिलियन टन कोयला उत्पादन की योजना है।

आमगाँव के मुरली नायक का कहना है कि जनसुनवाई से पहले प्रभावित पंचायतों से ग्राम सभा की अनुमति नहीं ली गई। उनका आरोप है कि स्थानीय स्वशासन और ग्राम सभा के अधिकारों की अनदेखी की गई।उनका कहना है कि क्षेत्र पहले से ही खदानों, रेलवे लाइन और उद्योगों के कारण धूल, पानी और प्रदूषण की समस्या झेल रहा है। ऐसे में नई परियोजनाओं से ग्रामीणों की परेशानियां और बढ़ सकती हैं।

आमगाँव के मुरली नायक

पर्यावरण और स्वास्थ्य पर प्रभाव

प्रस्तावित गारे पेलमा सेक्टर-1 परियोजना को लेकर तैयार आपत्ति रिपोर्ट में दावा किया गया है कि क्षेत्र की वायु गुणवत्ता पहले से ही राष्ट्रीय मानकों से अधिक प्रदूषित है।
रिपोर्ट के अनुसार धौराभाटा, तपरंगा, सारसमाल और तमनार जैसे क्षेत्रों में PM10 का स्तर राष्ट्रीय वार्षिक मानक 60 µg/m³ से अधिक दर्ज किया गया।
रिपोर्ट में कोयला भंडारण और खदानों में आग से निकलने वाले प्रदूषक तत्वों को लेकर भी चिंता जताई गई है। इसमें कहा गया है कि PM2.5, सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसे प्रदूषक लंबे समय तक स्वास्थ्य पर असर डाल सकते हैं।
स्वास्थ्य सर्वे का हवाला देते हुए रिपोर्ट में सांस संबंधी बीमारियों, उच्च रक्तचाप और टीबी जैसी समस्याओं का उल्लेख किया गया है। सर्वे के अनुसार कई ग्रामीणों में सांस लेने में परेशानी, लगातार खांसी और फेफड़ों से जुड़ी समस्याएं पाई गईं।
परियोजना से 14 गांवों के हजारों परिवार प्रभावित होने की आशंका जताई गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि विस्थापन केवल आर्थिक नुकसान नहीं होता, बल्कि जंगल, सामाजिक संबंधों और सांस्कृतिक जीवन से जुड़ा नुकसान भी होता है, जिसकी भरपाई केवल मुआवजे से संभव नहीं है।

भारत के संविधान में ‘जीवन का अधिकार’ (अनुच्छेद 21) सिर्फ जीवित रहने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह गरिमामय जीवन जीने की गारंटी देता है, जिसके लिए एक स्वस्थ और प्रदूषण-मुक्त पर्यावरण अत्यंत आवश्यक है.

एनजीटी में ग्रामीणों की याचिका

गारे पेलमा IV/2 और IV/3 कोल ब्लॉक में प्रदूषण, ब्लास्टिंग और पर्यावरणीय नुकसान को लेकर ग्रामीणों ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT), नई दिल्ली में याचिका दायर की थी।
ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि खनन गतिविधियों से गांवों के पास ब्लास्टिंग, घरों को नुकसान, भूजल संकट, जंगलों पर असर और स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ी हैं।
जांच समिति ने क्षेत्र का निरीक्षण किया और अपनी रिपोर्ट में कुछ स्थानों पर खदान और गांवों के बीच कम दूरी, फ्लाई ऐश प्रबंधन की समस्या और धूल नियंत्रण उपायों की कमी का उल्लेख किया।
NGT ने कहा कि पर्यावरणीय नुकसान की जिम्मेदारी केवल इस आधार पर समाप्त नहीं हो सकती कि किसी समय कोल ब्लॉक रद्द हो गया था। ट्रिब्यूनल ने पर्यावरण संरक्षण के लिए कई उपाय सुझाए, जिनमें बफर जोन, ग्रीन बेल्ट, वायु गुणवत्ता निगरानी और स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करना शामिल था।

अस्तित्व का सवाल है 

सामाजिक कार्यकर्ता रिनचिन का कहना है कि खनन परियोजनाओं में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रभावित समुदायों की वास्तविक भागीदारी सुनिश्चित की जा रही है।
उनका आरोप है कि कई क्षेत्रों में ग्राम सभा की प्रक्रिया को कमजोर किया गया और स्थानीय लोगों की सहमति के बिना निर्णय लिए गए। उनका कहना है कि संविधान ने अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा को केवल सलाह देने वाली संस्था नहीं, बल्कि स्थानीय शासन की महत्वपूर्ण इकाई माना है।
पत्रकार योगेश यादव बताते हैं कि कई जनसुनवाई में ग्रामीणों को पर्याप्त भागीदारी नहीं मिल पाई। उनके अनुसार यदि प्रभावित लोगों को निर्णय प्रक्रिया से बाहर रखा जाता है तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक भावना के विपरीत है।
तमनार क्षेत्र का संघर्ष इसी मूल प्रश्न पर केंद्रित है—क्या विकास की प्रक्रिया में स्थानीय समुदायों की आवाज, पर्यावरण संरक्षण और संवैधानिक अधिकारों को समान महत्व दिया जा रहा है? ग्रामीणों के लिए यह केवल खनन परियोजना का विरोध नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व, अधिकारों और भविष्य की रक्षा का सवाल है

थमीर कश्यप
थमीर कश्यप
थमीर कश्यप बस्तर, छत्तीसगढ़ के पत्रकार, डॉक्यूमेंट्री फोटोग्राफर और फिल्ममेकर हैं। वे आदिवासी संस्कृति, ग्रामीण जीवन, जंगल और बस्तर के जमीनी मुद्दों पर अपनी विशेष रिपोर्टिंग और विजुअल स्टोरीटेलिंग के लिए जाने जाते हैं। उनकी कहानियाँ बस्तर की परंपरा, संस्कृति और स्थानीय समुदायों की आवाज़ को प्रमुखता से सामने लाती हैं।
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