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मध्य प्रदेश: बॅाक्साइड परियोजना में अपने हक-अधिकार के लिए चिंतित हैं आदिवासी लोग!

भोपाल। मध्य प्रदेश का बालाघाट शहर पर्यावरणीय दृष्टि से समृद्ध माना जाता है। बालाघाट में लोगों की आजीविका के कई साधन हैं। इन साधनों में प्रमुख तौर पर कृषि माना जाता है। पाँचवी अनुसूची में आने वाले बालाघाट में कई खनन परियोजनाएं आती है। जो यहाँ पर्यावरणीय संकट जैसी कई चुनौतियाँ खड़ी कर जाती है। ऐसी ही एक परियोजना अभी चर्चा में बनी हुयी है। जो दादरटोला-दादर बॉक्साइट ब्लॉक परियोजना नाम से सामने आ रही है।

क्या है परियोजना

परियोजना खनन क्षेत्र ग्राम पचामा, तहसील- बेहर, जिला बालाघाट, राज्य मध्य प्रदेश के समीप स्थित है। जिसका कुल क्षेत्रफल 60.230 हेक्टेयर है। संबंधित खनन परियोजना का प्रस्तावक मध्य प्रदेश राज्य खनिज निगम है। परियोजना प्रस्तावक द्वारा स्वीकृत खनन योजना के अनुसार पाँच वर्षों की अवधि के लिए अधिकतम उत्पादन क्षमता 1,03,870.00 टन प्रति वर्ष प्रस्तावित की गई है। इस खदान की अनुमानित आयु 17 वर्ष है। खनन क्षेत्र ग्राम पचामा के वन कक्ष क्रमांक 1806 और 1808 में स्थित है। परियोजना की लागत 5.46 करोड़ है। परियोजना प्रस्तावित अवधि के दौरान खनन काल में लगभग 30,84 पौधे लगायें जायेंगे। अवधारणात्मक अवधि कांसेप्चुअल पीरियड के दौरान खनन क्षेत्र के 2.57 हेक्टेयर क्षेत्र को वृक्षारोपण द्वारा रिहैबिलिटेशन किया जाएगा।

आदिवासी लोगों की चिंताएं

परियोजना को लेकर परियोजना क्षेत्र का आदिवासी वर्ग क्यों चिंतित है और उसके मन में क्या विचार है यह जानने के लिए हमने एक संवाद आदिवासी लोगों से किया।

अंकुश पन्द्रे 30 वर्ष के हैं। वह एक कृषक हैं। वे हमें बताते हैं कि, ‘बॉक्साइड परियोजनाएं जहां-जहां आती हैं वहाँ का सार्वजनिक जनजीवन प्रभावित हो जाता है। ऐसे ही हमारे क्षेत्र में इस परियोजना से जल, वायु प्रभावित होने के खतरा है। वहीं, परियोजना से प्रदूषण की स्थिति भी सामने आने का अंदेशा है। बॉक्साइड जैसे परियोजनाएं आने से बालाघाट में पलायन का संकट भी लोगों के ऊपर आ रहा है। ऐसे ही हमें लग रहा है कि, कहीं हम भी परियोजना आने के बाद पलायन का शिकार न हो जाए।

बमनी की महाड़े पन्द्रे 34 वर्ष की हैं। वे कहती हैं कि, ‘बॉक्साइड परियोजना के संबंध में हम चाहते हैं कि, हमारे साथ प्रशासन पारदर्शिता का पालन करें। इस परियोजना में अभी प्रशासनिक स्तर पर क्या-क्या कार्य हुआ है इसकी हमें कोई जानकारी नहीं दी गयी है। ना ही हमें भविष्य में होने वाले कार्यों के संबंध में हमें बताया गया है। इस परियोजना से कई तरह के नुकसान हमें सीधे झेलने पड़ेगे। जैसे, जंगल में पेड़ों कटाई होने से पर्यावरण को क्षति होगी। वहीं, हमारे मवेशियों के चराई भूमि को नुकसान होगा।,

महाड़े पंद्रे
महाड़े पंद्रे

दिनेश टेकाम 26 बताते हैं कि, ‘गाँव के लोग इस परियोजना को लेकर कई तरह की चिंताओं से भरे हुए हैं। लोग सोचते हैं कि, ऐसा ना हो कि परियोजना के कारण हमें गाँव ही छोड़ना पड़ जाए। इस परियोजना में प्रभावित गाँव के ग्रामीण क्या सोचते और चाहते हैं? इस विचार पर शासन-प्रशासन का कोई खास ध्यान नहीं है। ऐसे में गाँव वाले यह भी समझ रहे जिस जंगल को हम पूजते आ रहे हैं। रक्षा करते आ रहे हैं। उसके विभिन्न उत्पादों पर निर्भर हैं। उस जंगल को परियोजना के रूप में उपयोग में लिया जा रहा है लेकिन, इस पर ग्रामवासियों से विशेष राय नहीं ली जा रही है। ना ही उनकी भावनाओं और विचारों को महत्वपूर्ण समझा जा रहा है।,

गोदान मर्शकोले 34 कहते हैं कि, ‘बालाघाट में कई बॉक्साइड परियोजनाएं आई हैं। लेकिन, इन परियोजनाओं से यहाँ के लोगों को कोई विशेष फायदा नहीं मिला है। ना ही सरकार कोई ऐसी योजना का लाभ दे पायी है जिससे परियोजना क्षेत्र के लोगों को कुछ राहत मिल पायी हो। यह बॉक्साइड परियोजना आने से आस-पास के गाँव में भी विस्थापन की स्थिति ना बन जाए यह ग्रामीणों के मन में हल-चल पैदा कर रहे हैं। वहीं, परियोजना से भूमि बंजर, जल स्तर घटने की समस्याएं भी हो सकती हैं।,

पंचम और गोदान ऊईके।
पंचम और गोदान ऊईके।

बमनी गाँव में ही हमें मिलते हैं 31 वर्षीय शंकर टेकाम। वे इस परियोजना को लेकर कहते हैं कि, ‘इस परियोजना से जल, जंगल, ज़मीन प्रभावित होगी।‌ ऐसे में जो आदिवासी वर्ग जंगल उत्पादों पर निर्भर है उनकी जगंल से निर्भरता कम होगी‌। आदिवासी लोग तेंदू, हर्रा, महुआ, तेंदू पत्ता, लकड़ी, बांस, शहद, आंवला, पत्ते, औषधियां आदि पर निर्भर होता है। इस बॉक्साइट परियोजना से जो गांव प्रभावित होगें। उनका विकास ढह जायेगा। आजादी के दसकों बाद‌ इन गांव में बिजली सड़क, पानी, स्कूल जैसी बुनियादी सुविधाएं पहुंच रही थी। जिससे यह गांव विकास की ओर अग्रसर थे। अब गांव का विकास रुक जाएगा।,

बमनी के नैन सिंह ऊईके (उम्र करीब 40 वर्ष) से हमारी चर्चा होती है। वह हमें बताते हैं कि पीढ़ियों से आदिवासी वर्ग का पालन-पोषण करने वाला जंगल ही रहा है। हमारा पारंपरिक निवास भी जंगलों में ही रहा है। ऐसे में जंगल में खनन करके उसे प्रभावित करना उचित नहीं लगता है। जंगल का खनन सबसे ज्यादा हमारी जीविका पर असर डालेगा।
जब हमारी जीविका प्रभावित होगी तब हमें मजबूरी पलायन और बेदखली जैसी स्थिति का सामना करना पड़ेगा।

रामचंद्र ऊईके (उम्र लगभग 32 वर्ष) बमनी में वे भी हमें मिलते हैं।
उनसे जब हम बातचीत शुरू करते हैं तब वह कहते हैं कि, ‘जीवन के 32 वर्ष में जंगल में घूमते। जगंलीय फल-फूल तोड़ते-खाते गुजारे हैं। बचपन से जंगल के साथ हम रहते आ रहे हैं। अब ऐसा लगता है कि, जगंल हमारा घर है‌ और उससे संकट में डाला गया तब वास्तव में हमारे घर पर‌ खतरा होगा।’

आगे वह यह भी व्यक्त करते हैं कि, ‘बलाघाट में कई तरह की खदानें पहले से खोदी जा रही है। बालाघाट की पर्यावरणीय स्थिति के बीच खनन‌ एरिया बढ़ता जा रहा है। ऐसे में यहां की पर्यावरणीय स्थिति का ख्याल कैसे रखा जाए यह चिंताजनक है। यदि हमें यहां का पर्यावरण और सार्वजनिक जनजीवन सुरक्षित और संरक्षित करना है, तब खनन को सीमित करना होगा।’

लोगों ने सौंपा ज्ञापन

इस परियोजना को लेकर परियोजना क्षेत्र के नागरिकों ने एक ज्ञापन भी लिखा है।‌ यह ज्ञापन महाप्रबंधक (खान) दि म.प्र. स्टेट माईनिंग कारपोरेशन लि.मि. भोपाल और बालाघाट जिला कलेक्टर को लिखा है।‌ जिसमें दिनांक 30/01/2026 दर्ज है। ज्ञापन में लिखा गया है कि, बॉक्साइट ब्लाक क्षेत्र ग्राम पचामा (बालाघाट) संविधान का पांचवी अनुसूची क्षेत्र घोषित‌ है। वहीं, क्षेत्र में पेशा एक्ट 1996 नियम 2022 और वनाधिकार अधिनियम 2006 के तहत वनो के संरक्षण की जिम्मेदारी अनुसूचित जनजातीय और अन्य परमपरागत वन निवासी के तहत ग्राम सभा की होगी। इस स्थिति में बॉक्साइट ब्लाक खनन पूर्व प्रक्रिया/जनसुनवाई की कार्यवाही किया जायें। वहीं, स्थगित करने की जानकारी एक सप्ताह के भीतर संम्बधित ग्रामसभा, ग्राम पंचायतों को दिया जावे, अन्यथा स्थानीय जनसमुदाय, जनप्रतिनिधि, सामाजिक संगठन, एवं जनसंगठनों के संयुक्त् तत्वाधान में विशाल जनांदोलन चक्काजाम करने मजबूर होना पड़ेगा। तथा चक्का जाम जनांदोलन से प्रशासन और जनसमान्य को होने वाली असुविधा के सम्पूर्ण जिम्मदारी प्रशासन की होगी।

इस मामले पर विधायक संजय उईके ने इस मामले में एक आपत्ति पत्र अनुविभागीय अधिकारी बैहर जिला बालाघाट के नाम लिखा है। जो स्टेट माइनिंग कॉरपोरेशन लि. भोपाल की प्रस्तावित परियोजना की EIE\EIA रिपोर्ट के गंभीर त्रुटियों, अपूर्ण अध्ययन एवं जनहित की अनदेखी के संबंध में है। पत्र में रिपोर्ट को लेकर उल्लेख किया गया है कि, यह रिपोर्ट पर्यावरणीय, सामाजिक एवं आर्थिक और जन स्वास्थ्य से जुड़े वास्तविक प्रभावों को सही ढंग से प्रस्तुत नहीं करती है। इस पत्र में उल्लेख किया जाता है कि, प्रस्तावित परियोजना की EIA रिपोर्ट में यह कहना कि, (FRA एक्ट, 2006) लागू नहीं। कानून की स्पष्ट अवहेलना है। वहीं, EIA रिपोर्ट में ग्राम सभा की सहमति का उल्लेख नहीं है। पत्र में TRO एवं पर्यावरणीय स्वीकृति प्रक्रिया के उल्लघन की बात भी कही गयी। प्रस्तावित खनन क्षेत्र में निवासरत आदिवासी\वननिवासी समुदायों की आजीविका, सांस्कृतिक, पहचान एवं पारंपरिक संसाधनों पर निर्भरता है। FRA को नकारना उनके संवैधनिक एवं कानूनी अधिकारों का गंभीर हनन है।

परियोजना क्षेत्र में वृक्षों की संख्या 2489, प्रजातियों की संख्या 49, ग्रिड पाइट की संख्या 43 का भी जिक्र पत्र में किया गया है। इसके अलावा भी पत्र में कई तरह के बिंदुओं का जिक्र किया गया है।

वहीं बॉक्साइट परियोजना और बालाघाट के खनन की स्थिति पर हम बालाघाट में जल, जंगल, जमीन, आदिवासी, खनन के मुद्दों पर सालों से रिपोर्टिंग करते आ रहे पत्रकार नितेश उचबगले से भी उनका नज़रिया जानते हैं। इस दौरान वह कहते हैं कि, ‘बालाघाट के जिन इलाकों में लोगों ने पर्यावरण और जैव-विविधता को मैनेज करने का कार्य किया है वह इलाके उजाड़ने की कोशिश की जा रही है। इस स्थिति में सिस्टम को इसके वैकल्पिक व्यवस्थाओं के बारे में चिंतन करना चाहिए फिर खनन किया जाना‌ चाहिए।’

आगे नितेश बयां करते हैं कि, ‘बालाघाट में मैग्नीज और बॉक्साइट की विभिन्न खदाने हैं इसके लिए बालाघाट प्रसिद्ध भी है लेकिन, सोचने योग्य है कि, बालाघाट जो देश को दे रहा है उसके बदले देश बालाघाट को क्या दे रहा है? वहीं, यहां की खदानें खासतौर पर आदिवासी लोगों को रोजगार नहीं दे पाती हैं। जिससे वे पलायन करते बड़े शहरों के लिए। ऐसे ही बालाघाट में लगातार होते खनन से वन्य जीव के इलाकों पर संकट, वन्यजीव व मानव के बीच संघर्ष बढ़ने की स्थिति के साथ पारिस्थितिक तंत्र बिगड़ने का खतरा है।’

इस परियोजना के संबंध में विधायक श्री संजय उईके कहते हैं कि, ‘इस बॉक्साइट परियोजना के संबंध में ज्ञापन देने से लेकर धरना, आंदोलन करने तक की लड़ाई हम लड़ते आ रहे हैं। हमारा मानना है कि, जो भी परियोजना आये, उसमें नियमों का पालन किया जाना चाहिए।’

इसके आगे वह कहते हैं कि, ‘इस परियोजना में वनाधिकार कानून का पालन‌ करना जरूरी है। साथ में ग्रामसभा की सहमति लेना भी आवश्यक है। इसके बिना‌ परियोजना आगे नहीं बढ़नी चाहिए। वहीं, परियोजना से आदिवासी संस्कृति, सभ्यता और परंपरा को भी नुकसान होगा।’

हमने इस पूरे मामले में बरगी बांध विस्थापित संघ से जुड़े और‌ पर्यावरण के विषयों पर कार्य कर रहे समाजिक कार्यकर्ता राजकुमार सिन्हा से भी चर्चा की। इस दौरान वह बयां करते हैं कि, ‘पचामा दादर में बाक्साइड खनन प्रक्रिया में पर्यावरणीय सावधानी का अभाव है। यह दर्शाता है कि राजस्व प्राथमिकता को पर्यावरणीय न्याय एवं संवैधानिक अधिकारों से ऊपर रखा गया है। इसलिए ग्राम सभाओं की सहमति के साथ वन अधिकार कानून, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम एवं ईआईए अधिसूचना का पूर्ण अनुपालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।’

सतीश भारतीय
सतीश भारतीय
सतीश भारतीय मध्यप्रदेश के एक स्वतंत्र पत्रकार हैं। वे मानवाधिकार, पर्यावरण, जीविका, स्वास्थ्य, भूमि और महिलाओं के मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हैं। वे संविधान, वाईस फैलोशिप का हिस्सा रह चुके हैं।
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