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मध्यप्रदेश: हीटवेव के संकट से उपजी चुनौतियां झेलने को क्यों मजबूर हैं सहरिया आदिवासी!

मध्यप्रदेश के विदिशा जिले में आने वाला गंजबासौदा एक पथरीला क्षेत्र माना‌ जाता है। इस क्षेत्र के ग्रामीण इलाके काफी पिछड़े हैं। जहां रोजगार के कई साधनों में से एक प्रमुख साधन पत्थर की खदाने भी हैं। जहां से पत्थर खोदा और बेचा जाता है। यह खदाने चिलचिलाती धूप में बेहद तप जाती हैं। ऐसे में खदानों के आसपास बसे गाँव में गर्मी का असर और भीषण हो जाता है। जबकि, खदानों के पास बसे गाँव में घर भी पत्थर के बने हुए हैं। इस स्थिति में यहाँ हीटवेव की समस्या मुख्य तौर पर देखने मिलती हैं। खास तौर पर हीटवेव उन गाँव पर कहर बरसाती हैं जहां संसाधनों की कमी है। लोग गरीब है। मजदूरी करते हैं।

ऐसे में हमने विदिशा जिले की गंजबासोदा तहसील के कुछ गाँव का भ्रमण किया। जो गंजबसोदा से करीब 40 किमी दूर हैं। इन गाँव में आबूपुर कुचौली, साहबा टपरा, नहारिया और शंकरगढ़ गाँव शामिल हैं। जहां मुख्यत: पिछड़े समुदायों में शामिल सहरिया आदिवासी समुदाय निवास करता है। यहाँ हम यह देखने का प्रयास करते हैं कि, हीटवेव से ग्रामीण किस तरह चुनौतियां के बीच संघर्षरत हैं।

आबूपुर कुचौली गाँव में हीटवेव  

पहले हम आबूपुर कुचौली गाँव पहुँचते हैं। यह गाँव आज भी बिजली, पानी, रोजगार जैसी चुनौतियों में फंसा है। गाँव में ज्यादातर आदिवासी पत्थर खदानों में मजदूरी करने जाते हैं। मेवा बाई सहरिया आदिवासी 40 वर्ष की हैं। वे बयां करती हैं कि, ‘इस बार की गर्मी इतनी भयंकर है कि ऐसा लगता है कि हवा लपटें फैला रही हो। अब सामान्य या थोड़ी ठंडी हवा केवल रात में 3 बजे के बाद महसूस होती है।, 

‘ऐसी गर्मी में हमारे गाँव में कूलर गिने चुने लोगों के पास है। वहीं, कुछ लोगों के पास पंखा है। मुझे जैसे जिन लोगों के पास कूलर, पंखा नहीं हैं, उन्हें घर के आँगन, छतों और चबूतरों पर सोना पड़ता है। गर्मी ऐसी लगती है रात में कि, सोने के कपड़ों पर पानी छिड़कना पड़ता है।,

गाँव की अनीता सहरिया (38) बतलाती हैं कि, ‘इस बार की भीषण गर्मी से मुझे लू लग गयी थी। लू के कारण बुखार, शरीर दर्द करना जैसे कई परेशानी बनी रही। मेरा स्वास्थ्य कई दिनों से खराब है। गर्मी के कारण एक तो खाना-पीना भी रास नहीं आ रहा। थकावट बनी रहती है और नींद आती है।, 

‘वहीं गाँव में गर्मी के कारण बच्चों, बुजुर्गों ज़्यादा उलटी-दस्त की शिकायत हो रही है। साथ में गर्मी से बचाव की कोई जागरूकता नहीं हैं। गर्मी का कहर ऐसा है कि, कई बुजुर्ग चक्कर खाकर गिर भी जाते हैं। कल ही कि बात है मेरे घर के बाजू वाली अम्मा को धूप में चक्कर आ गया था और गिर गयीं थी तब मैंने उन्हें उठाया था।, यह बोलकर रुक जाती हैं अनीता।

आगे गाँव में हम प्रह्लाद सहरिया आदिवासी (45) के घर भी जाते है। वे पत्थर खदानों में मजदूरी करते रहे हैं जिससे धूल, मिट्टी प्रदूषण के कारण टीबी के शिकार हो गए हैं। प्रह्लाद के अलावा भी गाँव के कई लोग टीबी से पीड़ित हैं और कई की जीवनलीला खत्म हो गयी। वे बताते हैं कि, ‘गर्मी के कारण सांस लेने में परेशानी, चक्कर आना, शरीर में जलन, उल्टियाँ होना जैसे स्वास्थ्य संकट मुझे जैसे गाँव के कई टीबी मरीजों को भोगने पड़ रहे हैं। इसके अलावा जो टीबी की दवाई और गोलियां मिलती हैं, वह भी गर्मी के कारण शरीर की तासीर गरम कर देती है। सबसे बड़ी दिक्कत हम टीबी के मरीजों को गर्मी के कारण घबराहट की हो रही है।, 

प्रह्लाद का दुख-दर्द सुनने के बाद गाँव में जब हम अंदर जाते हैं तब मगल सिंह सहरिया (66) हमें एक चबूतरे पर बैठे मिलते हैं। वे कहते हैं कि, ‘गाँव में अधिक गर्मी का मुख्य कारण पत्थरों के घर होना और गाँव के इर्द-गिर्द पत्थरों की खदाने होना है। गर्मी के कारण पत्थर बहुत तपता है। स्थिति यह होती है कि, घरों में रहना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में कई लोग पेड़ों के आस-पास रहते हैं। भले ही पेड़ अभी गरम हवा दे रहे हैं। पर हवा तो दे रहे हैं।  

साहबा टपरा में गर्मी से परेशानी

मगल सिंह के शब्द कानों में लिए हम निकलते हैं बाइक से ग्राम साहबा टापरा की ओर। करीब 15 मिनिट में हम साहबा टपरा पहुचते हैं। इस गाँव में प्रवेश करने पर हम अधिकतर पत्थर के घर देखते हैं। गाँव में कोई महिला आँगन लीपती, कोई धूप में पानी सिर पर ढोती तो कोई व्यक्ति घर की मरम्मत करते दिखाई देता है। गाँव में अधिकतर आदिवासी परिवार हैं। इन परिवार के लोगों से हम हीट-वेव पर चर्चा करते हैं। 

इस दौरान गाँव की मालती सहरिया आदिवासी (35) बताती हैं कि, ‘गर्मी और धूप इतनी अधिक है घर से बाहर कदम रखने का मन नहीं करता। घर के अंदर के काम तो करना हो जाता है जैसे-तैसे मगर, बाहर के काम जैसे जंगल से लकड़ी लाने, बकरी, मवेशियों को चराने, रिश्तेदारी में जाने के काम लोग सुबह-शाम में कर रहे हैं। गर्मी ऐसी है कि, एक भी दिन यदि नहा नहीं पाए तब सिर दर्द शुरू हो जाता है। सिर भारी हो जाता है।, 

गाँव की राम बाई सहरिया (45) बयां करती हैं कि, ‘गर्मी से सबसे ज्यादा परेशानी छोटे-छोटे बच्चों को लेकर हो रही है। छोटे-छोटे बच्चे धूप में ही खेलते हैं। अब उन्हें खेलने से रोक नहीं सकते। धूप और गर्मी से बच्चे अधिक बीमार पड़ रहे हैं। गाँव के बच्चों में फोड़ा, फुंसी, सर्दी, खांसी, बुखार जैसे स्वास्थ्य समस्या गर्मी के कारण देखने मिल रही है।, 

गाँव के युवा प्रकाश सहरिया (20) हमें घर के दरवाजे पर खड़े मिलते हैं। वे हीट-वेव की स्थति को लेकर वे बतलाते हैं कि, ‘गर्मी और धूप इतनी तेज है कि एक दिन खदान पर मजदूरी के लिए गया था तब बुखार आ गया था। एक दिन की मजदूरी का बुखार हफ्ते भर रहा था। अब हिम्मत नहीं पड़ रही मजदूरी पर जाने की। गाँव के कई लोग बारिश का इंतजार कर रहे हैं। जब बारिश का मौसम आ जाएगा तब लोग मजदूरी पर जायेगें। ऐसी धूप में काम करगें भी तो जितने की कमाई नहीं होगी उतना पैसा दवाई में लग जाएगा।,  

गाँव में हम आगे बढ़ते हैं तब मुल्लु सहरिया (45) से उनके घर पर मुलाकात होती हैं। वे हमें पसीने में भीगे और हाथों में कपड़े में लिपटी बोतल लिए मिलते हैं। वे बयां करते हैं कि, ‘गर्मी से हाल इतना बुरा है कि बनियान और चड्डा पर हैं फिर भी पसीना में भीगे हुए हैं। खेती का कुछ भी काम करते हैं तो पसीना शरीर पर बहने लगता है। शरीर में खुजली और जलन होने लगती है। ऐसा लगता है कि, पानी में डूबे रहे। नहाते रहें। गर्मी के कारण खाना पेट में ढंग से हजम नहीं हो रहा है इसलिए मुह में छाले की स्थिति भी बनी हुयी है।,

नहारिया में गर्मी की पीड़ा 

आगे हम गाँव में तेज धूप के बीच शांति और सनाके की स्थिति देखते हैं। ऐसे में हम निकल पड़ते हैं नहारिया गाँव के लिए। करीब 15 मिनिट बाइक से चलने पर नहारिया हमारी निगाहों के सामने होता है। नहारिया गाँव में हम देखते हैं कि, आदिवासी लोग गरीब और संसाधनहीन हैं। गाँव के दृश्य में कोई धूप में तेंदू पत्ता की गड्डियाँ एकजुट करता। कोई गाय-बछड़े को पेड़ के नीचे बांधता। तो कोई मिट्टी गीली करके कच्चे घर पर छापता दिखता है। यह नज़ारे देखते हुए हम गाँव में एक पीपल के पेड़ के पास पहुँचते हैं। जहां कुछ महिलाएं पीपल की छाया में बैठी थी। गर्मी पर संवाद करने पर गौरा सहरिया (50) बयां करती हैं कि, ‘गर्मी से सबसे ज्यादा मुझे शरीर में दर्द बना रहता है। हाथ-पैर, कमर दर्द करती रहती हैं। जबकि, थकावट और नींद की समस्या भी ज्यादा हो रही है।, 

तीजा बाई सहरिया (65) कहती हैं कि, ‘गर्मी के कारण कई प्रभाव देखने मिल रहे हैं। जैसे, यदि खाने में थोड़ा तेल ज्यादा हो जाए तब दस्त या उलटी की स्थिति बन जाती है। बुढ़ापे की अवस्था के कारण खाना का और अधिक ध्यान रखना पड़ता है। दिन में सुबह शाम के खाने में एक टाइम चावल जरूर खाना पड़ता। तभी पेट भरता है।,  

 गाँव में हम आगे की तरफ बढ़ते हैं तब धर्मपाल सहरिया (26) से मिलते हैं। वे गर्मी का आलम बया करते हुए कहते हैं कि, ‘गर्मी इतनी भयंकर है कि, सामान्य मौसम जो लोग 2-3 किमी पैदल चले जाया करते हैं वे इस चिलचिलाती धूप में 500 मीटर भी नहीं चल सकते। इतना चलने पर भी आंखे चक-चौधयाने लगती हैं। शरीर गरम हो जाता है। चेहरे का रंग उड़ जाता है।,  

धर्मपाल की बात सुनने के बाद आगे बढ़ने पर हमें एक चबूतरे के पास कुछ ओग मिलते हैं। उनमें से धन्नु सहरिया 45 वर्ष के हैं। वे कहते हैं कि, ‘इस गर्मी के मौसम सबसे ज्यादा परेशानी खदान मजदूरों को हो रही है। मैं खदान में पत्थर‌ तोड़ने का काम करता हूं। गर्मी में पत्थर का काम तर-बतर कर‌ देता। परिवार का पेट पालने के लिए मजबूरी में इतना मेहनती काम करना पड़ता। कोई और काम हमारे पास नहीं है।’

‘ऐसी कहर बरपाती गर्मी में खदान के पास सिर्फ लपटें, धूप, धूल और तपते पत्थर होते हैं। थोड़ा सुस्ताने के लिए भी कोई छाया या छायादार पेड़ नहीं होता। बस गर्म पत्थर या जमीन पर ही बैठना पड़ता है शांति लेने के लिए।’

शंकरगढ़ गांव  की गर्मी  

धन्नु सहरिया का दर्द सुनने के बाद हम निकलते हैं शंकरगढ़ गांव की ओर। तकरीबन 20 मिनिट में बाईक से हम शंकरगढ़ की धरती पर पहुंचते हैं। गांव के विकास की दशा इस तथ्य से समझी जा सकती है कि, शंकरगढ़ पहुंचने के लिए अभी भी कच्ची और थोड़ी पथरीली सड़क है। जो पत्थर की खदानों को चीरते हुए बीच से गुजरती है।

गांव में प्रवेश करते ही कुछ ग्रामीणों से भेंट होती। तब एक ग्रामीण मूलचंद सहरिया (35) बताते हैं कि, ‘मैं एक पत्थर खदान मजदूर हूं। गर्मी की मार सबसे ज्यादा खदान मजदूर झेल रहे हैं। खदानों के पास पीने तक का पानी नहीं है। पीने का पानी बोतल में गीला कपड़ा‌ लपेटकर ले जाते हैं। मगर, खदानों की गर्मी पानी गर्म कर देती है।’

‘खदानों का काम शरीर में इतनी गर्मी पैदा करता है कि गर्मी सहना असहनीय हो जाता है। ऐसा लगता शरीर पर ठंडा पानी उड़ेलते रहें। मगर, वहां ठंडा पानी तो नहीं लेकिन, गर्मी और धूप से पसीने में नहा जाते हैं।’

आगे हम बात करते दशोदा सहरिया (40) से वह बतलाती हैं कि, ‘गर्मी में हाल बहुत खराब है। गर्मी के कारण बच्चों को सिर पर फोड़ा हो रहे हैं। सिर में फोड़ो के वजह से बच्चा सिर खुजलाता रहता है। मेरे बच्चे को 3000 रूपए की दवाई करवा दी है। मुश्किल से आराम हो रहा है।’

गर्मी से परेशान पप्पू सहरिया (45) भी अपनी बात रखते हैं। वे कहते हैं कि, ‘शंकरगढ़ और उसके आसपास विभिन्न गांवों में गर्मी के कारण प्रमुख चुनौती पानी की होती है। गर्मी और धूप के कारण मार्च आते-आते नदियां, कुआं, तलाब सूख जाते हैं। नलों से पानी नहीं निकलता है। पानी लेने के लिए कड़कड़ाती धूप और लपटों के बीच 2-3 किमीं पैदल जाना पड़ता है।’ 

पप्पू सहरिया बातों ही बातों में सीएम हेल्पलाइन 181 पर गर्मी में आयी पानी किल्लत को लेकर शिकायत भी दर्ज करवाते हैं।

गांव में आगे बढ़ने पर जीतेश‌ सहरिया (34) के घर हम उनसे मिलते हैं। वे कहते हैं कि, ‘गर्मी और धूप इतनी ज्यादा है कि, धूप ज़्यादा रहने के बाद छाव में घर एक अंदर प्रवेश करो तो आँखों के सामने अंधेरा छा जाता है। वहीं, धूप में सिर दर्द करने लगता। यदि सिर के बाल लंबे हो तब तो गर्मी में खैर नहीं रहती।’

‘गर्मी के कारण शरीर में पानी की कमी (डिहाइड्रेशन) की समस्या भी बहुत देखने को मिल रही है। मुझे भी इस समस्या का सामना करना पड़ रहा है। अत्यधिक गर्मी में मुझ सहित गांव में कई ग्रामीणों को पेशाब में जलन, बार-बार पेशाब लगने जैसे कई स्वास्थ्य संकट भोगने पड़‌ रहे हैं।’

जीतेश के घर से कुछ दूरी पर रामकली सहरिया (32) का घर बना है। घर पर रामकली साफ-सफाई का काम कर रही होती हैं कि, तभी हम पहुंचते हैं।

उनका हालचाल जानने के बाद जब हम हीटवेव पर चर्चा करते हैं तब वह कहती हैं कि, ‘गांव‌ में लोगों के पास पंखा-कूलर की सुविधा बहुत कम है। किसी के पास कूलर है भी तब पानी की परेशानी है। कुल मिलाकर लपटों जैसी हवा ही लोगों को मिल रही‌ है।’

रामकली आखिर में इस कहानी को अंत की ओर ले जाती हुई कहती हैं कि, ‘गांव में आये दिन किसी ना किसी को लू लगने की परेशानी भी उठानी पड़ रही है। मैं खुद एक दिन‌ बजार विदिशा गयी बाईक से तब लू का शिकार हो गयी। करीब 8-10 दिन तबियत खराब रही है। हम जैसे ग्रामीण अब वर्षा का इंतजार कर रहे हैं ताकि, गर्मी और उससे पैदा हो रहे स्वास्थ्य संकट से आहत लोगों का राहत मिले।’

पर्यावरणविद् का नजरिया

राजधानी भोपाल के पर्यावरणविद् सुभाष सी पांडे से भी हमने हीटवेव की स्थिति पर‌ उनका विचार जानना चाहा। तब वह कहते हैं कि, ‘गंजबासौदा का अधितर भाग पथरीली जमीन पर है। इस एरिया में पत्थर की खदानें भी है। वहां पेड़ों की भी अधिक कटाई हुयी है। ऐसे यह एरिया अधिक हीट की स्थिति में हैं। जिससे लू जैसे स्वास्थ्य संकट देखने मिलते हैं।’

आगे वह कहते हैं कि, ‘देश में जनसंख्या और कार्बन डाइऑक्साइड गैस अधिक बढ़ने के कारण हीट और हीटवेव की स्थिति बढ़ रही है। हीट की स्थिति वहां कम हो सकती है जहां अधिक जल के अधिक श्रोत हैं। हीट से निपटने का समाधान पेड़ लगाना और उनका संवर्धन करना है। पेड़ पानी, हवा और‌ छाया को बढ़ाते हैं जिससे हीट कम होता है।’

गंजबासोदा में तापमान 

गंजबासोदा में मई माह में 1 मई से 31 मई के‌ बीच अधिकतम तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से लेकर‌ 44 डिग्री सेल्सियस तक रहा है। जबकि, सबसे कम तापमान 5,6,7, 22 और 31 तारीख को क्रमशः 37, 38, 39, 39, 38 डिग्री सेल्सियस रहा है। वहीं, रात का तापमान 1 मई से 31 मई के बीच 21 डिग्री सेल्सियस से लेकर 34 डिग्री सेल्सियस तक रहा है। रात में सबसे अधिक तापमान 25 मई को 34 डिग्री सेल्सियस रहा। जबकि, सबसे कम रात का तापमान 5 मई को 21 डिग्री सेल्सियस रिकॉर्ड किया गया। 

हीटवेव से स्वास्थ्य और क्षति

देश-दुनियाँ में हीटवेव कई तरह के स्वास्थ्य संकट पैदा कर रही है। साथ में एक व्यापक आबादी की जान भी लील रही है। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाईजेशन की इस वर्ष की रिपोर्ट के मुताबिक, अत्यधिक हीट-वेव से हदय, श्वसन, मानसिक, मधुमेह, अस्थमा, गुर्दे सम्बधी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। देखा जाए तब समझ आता है कि, हीट-वेव का सबसे ज्यादा असर मजदूर वर्ग, बुजुर्ग, महिलाओं, गरीबों और ग्रामीण स्तर पर संसाधनहीन समुदायों पर पड़ता है।

वहीं, एक नए अध्ययन के अनुमानुसार, भीषण गर्मी से भारत में राष्ट्रीय स्तर पर एक दिन की अत्यधिक गर्मी से लगभग 3,400 मौतें हो सकती हैं। जबकि, पाँच दिन की हीट-वेव से करीबन 30000 लोगों की जान जा सकती है। इस स्थिति के बावजूद भी भारत जैसे देश में जिला स्तर पर हीट-वेव से मृत्यु दर पर पढ़ने वाले प्रभाव से संबधित स्थानीय डेटा शोधकर्ताओं के लिए विशेषत: उपलब्ध नहीं है। ऐसे में देश स्तर पर हीट-वेव से हो रही मौतों के आंकड़ों को समझना और मुश्किल हो जाता है। 

ऐसे ही, दुनियाँ के सभी क्षेत्रों में अत्यधिक गर्मी के संपर्क में आने वाले लोगों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। 65 वर्ष से अधिक आयु के लोगों के लिए गर्मी से संबंधित मृत्यु दर वर्ष 2000-2004 और 2017-2021 के बीच लगभग 85 प्रतिशत बढ़ गयी है। वर्ष 2000-2019 के बीच किए अध्ययनों से पता चलता है कि, प्रतिवर्ष लगभग 489,000 मौतें गर्मी से संबंधित कारणों से होती हैं। इन मौतों में 45 प्रतिशत मौतें एशिया में और 36 प्रतिशत मौतें यूरोप में होती हैं। 

हीट-वेव हेतु सरकारी एडवाइजरी

देश के कई हिस्सों में तापमान में लगातार वृद्धि की स्थिति सामने आ रही है। इस स्थिति में सामान्य से अधिक गर्मी की स्थिति को देखते हुए बीते अप्रैल माह में भारतीय मौसम विज्ञान विभाग द्वारा दिशा निर्देश जारी करने की सलाह दी गयी। लू की स्थिति को देखते हुए यह दिशा-निर्देश जारी किए गए। दिशा-निर्देशों के तहत सीधे धूप में लंबे समय तक रहने से बचना, पर्याप्त मात्रा में पानी पीना, हल्के और हवादार कपड़े पहनना और उच्च तापमान के दौरान कठिन बाहरी गतिविधियों से बचने की जानकारी दी गयी। साथ में बच्चों, बुजुर्गों और पहले से अस्वस्थ्य व्यक्तियों को विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी गई है। 

गर्मी से परेशान व्यक्तियों के लिए ठंडी छायादार जगह पर ले जाए। ठंडा पानी पिलाएं। उसे हवा की सुविधा दें। डॉक्टर की सलाह लें। नशे से दूर रखें। चेहरे पर ठंडा और गीला कपड़ा रखें। गर्मी की आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए पानी की बोतल, छाता, टोपी, तौलिया, ग्लूकोज पास रखें। जैसे विभिन्न उपाये सुझाए गए।     

दिशा-निर्देश में शिशु, गर्भवती महिलाएं, श्रमिको अतिरिक्त देखभाल की आवश्यकता बताई गयी। कार्यस्थलों, सार्वजनिक आयोजनों, बाहरी गतिविधियों के लिए विशेष सावधानी सुझायी गयी। जिसमें, छाछ, नारियल पानी, नींबू पेय पीने। दैनिक आहार में तरबूज, नीबू, खरबूजा, लौकी, टमाटर शामिल करने की सलाह दी गयी। साथ में, हर्बल लेप लगाने के बारे में भी कहा गया। वहीं, चक्कर आना, सिर दर्द, बेहोशी, शरीर का अत्यधिक तापमान होने पर सतर्कता की चेतावनी दी गयी। साथ में, हीटस्ट्रोक को एक चिकित्सा आपात स्थिति बताया गया और गंभीर मामलों में 108/102 आपातकालीन हेल्प लाइन पर संपर्क करने की सलाह दी गयी। इसके अलावा छायादार विश्राम, स्थलों की व्यवस्था, नियमित जलपान, अवकाश, श्रमिकों के लिए अनुकूल उपाय कर प्रति जागरूकता बढ़ाना शामिल किया गया।

सतीश भारतीय
सतीश भारतीय
सतीश भारतीय मध्यप्रदेश के एक स्वतंत्र पत्रकार हैं। वे मानवाधिकार, पर्यावरण, जीविका, स्वास्थ्य, भूमि और महिलाओं के मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हैं। वे संविधान, वाईस फैलोशिप का हिस्सा रह चुके हैं।
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