HomeUncategorizedमध्यप्रदेश: हीटवेव की चुनौती, संघर्ष, प्रभाव से क्यों पीड़ित है आदिवासी समुदाय!

मध्यप्रदेश: हीटवेव की चुनौती, संघर्ष, प्रभाव से क्यों पीड़ित है आदिवासी समुदाय!

BHOPALदेश-दुनियाँ इस समय जलवायु परिवर्तन की स्थिति झेल रही है। जलवायु परिवर्तन कई तरह के संकट सार्वजनिक जनजीवन में पैदा कर रहा हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण एक ऐसा ही संकट हीट-वेव के रूप में बढ़ता जा रहा है। एक नए अध्ययन के अनुमानुसार, भीषण गर्मी से भारत में राष्ट्रीय स्तर पर एक दिन की अत्यधिक गर्मी से लगभग 3,400 मौतें हो सकती हैं। जबकि, पाँच दिन की हीट-वेव से करीबन 30000 लोगों की जान जा सकती है। इस स्थिति के बावजूद भी भारत जैसे देश में जिला स्तर पर हीट-वेव से मृत्यु दर पर पढ़ने वाले प्रभाव से संबधित स्थानीय डेटा शोधकर्ताओं के लिए विशेषत: उपलब्ध नहीं है। ऐसे में देश स्तर पर हीट-वेव से हो रही मौतों के आंकड़ों को समझना और मुश्किल हो जाता है।

वहीं, दुनियाँ के सभी क्षेत्रों में अत्यधिक गर्मी के संपर्क में आने वाले लोगों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। 65 वर्ष से अधिक आयु के लोगों के लिए गर्मी से संबंधित मृत्यु दर वर्ष 2000-2004 और 2017-2021 के बीच लगभग 85 प्रतिशत बढ़ गयी है। वर्ष 2000-2019 के बीच किए अध्ययनों से पता चलता है कि, प्रतिवर्ष लगभग 489,000 मौतें गर्मी से संबंधित कारणों से होती हैं। इन मौतों में 45 प्रतिशत मौतें एशिया में और 36 प्रतिशत मौतें यूरोप में होती हैं।

वहीं, वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाईजेशन की इस वर्ष की रिपोर्ट के मुताबिक, अत्यधिक हीट-वेव से हदय, श्वसन, मानसिक, मधुमेह, अस्थमा, गुर्दे सम्बधी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। देखा जाए तब समझ आता है कि, हीट-वेव का सबसे ज्यादा असर मजदूर वर्ग, बुजुर्ग, महिलाओं, गरीबों और ग्रामीण स्तर पर संसाधनहीन समुदायों पर पड़ता है।

ऐसे में हमने ग्रामीण स्तर पर मजदूर वर्ग के जीवन में हीट-वेव क्या असर डाल रही है? हीट-वेव से मजदूरों को क्या चुनौतियाँ झेलनी पड़ रहीं हैं? उनके पास हीट-वेव से निपटने के क्या उपाय और संसाधन हैं? जैसे कई सवालों की जिज्ञासाओं को शांत करने के लिए पन्ना जिले के ग्रामीण इलाके का दौरा किया। पन्ना मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में आता है। प्रदेश की राजधानी भोपाल से पन्ना करीब 400 किमी दूर है। देश-दुनियाँ में पन्ना हीरे के लिए मशहूर है। मगर, इसके बावजूद भी पन्ना को एक पिछड़े जिले के रूप में भी देखा जाता है।

पन्ना के ग्रामीण इलाकों में हम बड़ौर, कैमासन, मडै़यन और मनौर सहित कई आदिवासी गाँव का भ्रमण करते हैं। यह आदिवासी गाँव पन्ना जिले और पन्ना तहसील का ही हिस्सा है। यह गाँव पन्ना से करीब 10-20 किमी की दूरी पर बसे हुए हैं।

बड़ौर गांव में गर्मी का प्रभाव

पहले हम पहुँचते हैं बड़ौर गाँव। यह गाँव काफी पिछड़ा है। लोगों के कच्चे घर बने हुए हैं। बिजली, पानी, रोजगार का अभाव है। 

बड़ोर गाँव में एक दुकान के पास हमारी मुलाकत कुछ ग्रामीणों से होती है। उनसे हम हीट-वेव के मुद्दे पर संवाद करते हैं। इस संवाद में गाँव के करीब 42 वर्षीय मनीराम सौर आदिवासी हमें बताते हैं कि, ‘इस बार बहुत ताबड़तोड़ गर्मी है। अप्रैल माह के अंत से तो‌ ऐसा लग रहा जैसे हवाएं आग की आंच बन‌ गयी हो। गर्मी से हालत इतनी खराब है कि, सुबह 9 बजे तक और शाम 5 के बाद धूप में रह सकते हैं। बीच के समय यदि में जरा भी धूप में पहुंच गयी तो चक्कर आने लगते हैं।’

मनीराम आदिवासी सौर

आगे वह कहते हैं कि, ‘गर्मी के कारण गाँव में कई लोग स्वास्थ्य संकट से भी जूझ रहे हैं। ऐसे ही मेरी पत्नी को‌ उल्टी-दस्त जैसी स्वास्थ्य समस्या है। जिसमें 1000 रुपए की दवाई करवा चुके हैं। इसके बाद भी तबियत में खास आराम नहीं है।’

मनीराम आगे हमें अपनी कच्ची झोपड़ी दिखाते हुए बताते हैं कि, ‘हमारे पास गर्मी में रहने के लिए ये केवल घांस-फूस की टपरी बस है। जिस पर पालीथीन छायी हुयी है। इस टपरी को रहने लायक बनाने के लिए मैं काम भी कर रहा हूँ। हमारे पास पंखा-कूलर कुछ नहीं है। रात-दिन गर्मी झेल रहे हैं।,

आगे वह यह कहते हुए अपने शब्द रोकते हैं कि, ‘मेरी झोपड़ी बहुत तपती है। इसलिए, सुबह 10 बजे के बाद शाम 5 तक पेड़ों के नीचे बैठना पड़ता है। हालांकि, पेड़ भी अब हवा के बजाए गर्म लपट ही दे रहे हैं। रात को हमें आंगन में सोना पड़ता है कच्छा-बनियान में।’

इसके आगे अपनी बात शुरू करती हैं कि, 65 वर्ष राजाबाई सौर आदिवासी। वे हमें बताती हैं कि, ‘मैं जलाऊ लकड़ी बेचकर अपनी जीविका चलाती हैं। हम खाना बनाने वाली लकड़ी लेने के लिए भी सुबह 5 बजे से जंगल जाते हैं और हर हाल में 9-10 के बीच आ जाते हैं। इतने में भी गर्मी के कारण इतना पसीना आता है कि, कपड़े भीग जाते हैं। वहीं, लकड़ियों की गठरी भी जगह-जगह उतारना पड़ती है।’ 

राजाबाई ज्यादा गर्मी की वजह गाँव में पत्थर ज्यादा होना और पत्थरों के पहाड़ से गाँव का  सटा हुआ होना मानती हैं। 

गाँव की आरती सौर‌ आदिवासी (31) अपने घर में किराना दुकान चलाती हैं। उनकी दुकान के ऊपर सीमेंट की सीट छायी हुयी है। वे बताती हैं कि, ‘गर्मी में पंखा, कूल‌र कुछ काम नहीं कर रहा है। सब गर्म हवा फेंक रहे हैं। गर्मी इतनी ज्यादा है की दोपहर में दुकान चलाने को परिवार के सदस्य तैयार नहीं होते। इसलिए मुझे दुकान में रहना पड़ता है।, 

गाँव में जब हम आगे बढ़ते हैं तब हमारी मुलाकात 18 वर्ष की शांति सौर आदिवासी गाँव से होती है। वे बच्चों को मुफ्त कोचिंग (कोचिंग का नाम बाल आंगन है) पढ़ाती हैं। वे बताती है कि, ‘हमारे घर में इतनी जगह नहीं है कि, गांव के बच्चों को घर बैठाकर कोचिंग दे सकें। ऐसे में बच्चों को आंगन में बैठाकर कोचिंग पढ़ाना पढ़ता है। पहले मैं शाम 4 बजे से कोचिंग पढ़ती थी। लेकिन, अब गर्मी में घर का आंगन इतना तप जाता है कि, बच्चे आगन में बैठ नहीं सकते।‌ जबकि, धूप भी बहुत तेज होती है। ऐसे में कोचिंग का समय मैंने 6 बजे कर दिया है।’ 

आगे वह कहती हैं कि, ‘गर्मी इतनी ज्यादा है कि, गांव में बच्चे‌ बुखार, उल्टी-दस्त से भी पीड़ित हो रहे हैं। जिस उन्हें कोचिंग पढ़ने में भी परेशानी आती है। वहीं, गांव में आदिवासी समुदाय संसाधनहीन है। ऐसे में वह कूलर जैसे साधनों की व्यवस्था भी नहीं कर पाता। मेरे पास भी कूलर नहीं है। इसलिए बच्चों को गर्मी में ही कोचिंग पढ़ाना पड़ता है।’

शांति को पीछे छोड़ते हुए हम आगे कदम बढ़ाते हैं तब हम मिलते हैं 25 वर्षीय ईश्वर। वे मजदूरी के जरिए अपना जीवन चलाते हैं। वे कहते हैं कि ‘गांव में ज्यादा आदिवासी परिवार है। ये परिवार मजदूरी पर निर्भर है। लेकिन, ऐसी गर्मी में बहुत से लोग मजदूरी के काम में नहीं जा रहे हैं। जाते भी हैं तो सुबह 7 बजे से 10 बजे तक काम करते हैं और शाम को 3 बजे से सात बजे तक काम करते हैं। इसके बावजूद गर्मी और‌ धूप मजदूरी के काम में चेहरे की चमक उड़ा देती है। शरीर को काला कर देती है।’

आगे ईश्वर वे बोलते हैं कि, ‘शहर पन्ना में हम जैसे मजदूरी के लिए फ्रिज या वाटरकूलर के ठंडे पानी की सुविधा नहीं है। ना ही, दोपहर के वक्त विश्राम के लिए छाया और हवा के लिए कूलर-पंखा की  व्यवस्था है। मजदूरी का मतलब तो कढ़ी मेहनत ही है। ज़रूरत की सुविधाएं भी नहीं मिलती।’

कैमासन गाँव में गर्मी पर बात

बड़ोर गाँव में हीट-वेव से पीड़ित ग्रामीणों का दर्द जानने-समझने के बाद हम रुख करते हैं कैमासन गाँव का। यह गाँव बड़ोर गाँव से सटा हुआ है। गाँव में करीब दोपहर में पहुचने पर हम देखते हैं कड़ी धूप और गर्मी में भी ग्रामीण अपने काम-काजों में लगे हुए हैं।

इस बीच जब हम लोगों से मुलाकात कर बातचीत करते हैं गर्मी के मुद्दे पर। तब मरियां गोंड आदिवासी (45) कहती हैं कि, ‘गर्मी इतनी ज्यादा है कि, खाना भी ढंग से हजम नहीं हो रहा है। प्यास ज्यादा लगती है। भूख कम लगती है। वहीं, पानी से पेट भी जाता है। मगर, प्यास बुझती नहीं है। ज्यादा पानी पी लें, तब पेट दर्द करने लगता है। इस स्थिति में कई स्वास्थ्य सम्बधी परेशानियाँ झेलनी पड़ती हैं। मैं भी गर्मी के कारण कई दिनों से लूज मोशन से पीड़ित हूँ। ऐसे ही खाने में कुछ अच्छा नहीं लग रहा है। सब्जियों की स्थिति यह है कि, कोई भी सब्जी बनाओ तो 4-5 घंटे में खराब हो जाती है। ऐसे ही रोटियां सूख जाती है।, 

हमारी चर्चा का हिस्सा कोमल गोंड (35) आदिवासी भी बनती हैं। इस दौरान वे बयां करती हैं कि, ‘गर्मी और‌ धूप का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि धूप में निकलों तो मोबाइल भी बेहद गर्म हो जाता है। फिर, सही से काम नहीं करता है। हैंग करता है। बार-बार बंद करके चालू करना पड़ता है।,

कोमल आगे बताती हैं कि, ‘हमारे गांव में आदिवासी समुदाय के ज्यादातर घर कच्चे और पत्थर के बने हुए है। इन घरों के छप्पर पर पत्थर की सिलाटे छायी हुयी हैं। ऐसे में घर गर्मी के मौसम में और ज्यादा गर्म हो जाते हैं।,

आगे कोमल जाहिर करती हैं कि, ‘गर्म घरों में रहना, सोना, उठना-बैठना भी मुश्किल हो जाता है। तब लोग आंगन या चबूतरों पर सोते हैं। मगर, फिर भी नींद नहीं लगती। गर्मी के कारण अच्छी नींद मध्य रात्रि के बाद 3 से बजे लगती हैं। तब 3 बजे 6-7 बजे तक लोग सूकून से सो पाते हैं।, 

आगे अपने विचार व्यक्त करते हुए गांव की 50 वर्षीय कुसुम गोंड बयां करती हैं कि, ‘जंगल के पास हमारा गाँव है। इस स्थिति में परंपरागत तौर पर हम मिट्टी के चूल्हे में लकड़ी जलाकर खाने पकाते आये हैं। वही खाना हमें अच्छा लगता है। मगर, इस समय इतनी गर्मी है कि, चूल्हे में लकड़ी डालते हैं तब बहुत आंच लगती है। आग पर रोटियां सेंकना बहुत मुश्किल हो जाता है।,

वे यह भी कहती हैं कि, ‘चूल्हे के पास पंखा भी रखते हैं तब भी आंच कम नहीं होती। पंखा की हवा भी आंच के रूप में ही रहती है। वहीं, खाना सुबह 6-8 बजे बना लिया तब थोड़ा कम गर्मी लगती यदि 8 के बाद बनाते तब पसीना-पसीना हो जाते हैं। ऐसे ही शाम को गर्मी के कारण खाना 6 के बाद ही बना पाते हैं।, 

इसके बाद हम आगे बढ़ते हैं तब अपने घर में खटिया पर लेते मिलते हैं लालमणि गोंड आदिवासी। वे 37 वर्षीय मजदूर हैं। लालमणि बताते हैं कि, ‘अभी मेरा स्वास्थ्य खराब चल रहा है। मुझे बुखार, कमजोरी और हाथ-पैर दर्द जैसे तकलीफ है। इसके इलाज में 5000 रुपये लगा चुका हूँ। यह सब बेहद गर्मी और लू के कारण हुआ है। मैं भीषण गर्मी और धूप में काम करता था। ऐसे में एक दिन की लू मेरा स्वास्थ्य गड़बड़ कर गयी। गर्मी और ऊपर से  स्वास्थ्य खराब होने से खाना भी कम खा पाता हूँ। इसलिए वजन भी कम हो गया है।, 

लालमड़ी गोंड

 

आगे वह बयां करते हैं कि, ‘गर्मी और तेज धूप के कारण गांव के लोग मजदूरी को नहीं जा रहे हैं। यदि जाते भी हैं तब हफ्ते 7 दिन में से उन 2-3 दिन‌ में जाते हैं जिनमें गर्मी थोड़ी कम होती है। इसके अलावा मेरे जैसे कई मजदूर बीमार भी हैं।,

आगे जब हम कैमासन गाँव से मडैयन को ओर जाने का रास्ता पकड़ते हैं तब हमें गाँव की नदी के पुल पर मिलते हैं 30 वर्षीय राकेश गोंड। वे गांव‌ में कोचिंग पढ़ाते हैं। राकेश बतलाते हैं कि, ‘गांव में गर्मी का प्रकोप तेज है। गर्मी का खासतौर पर बच्चों में असर देखने मिल रहा है। गर्मी की वजह से बच्चे अधिक बीमार हो रहे हैं। जिसका एक कारण उम्र की नाजुकता भी है। कई बच्चों में छोटी-छोटी फुन्सियां (कुरकुरूं) देखने भी मिल रही हैं। जो भयंकर गर्मी की देन‌ है। वहीं, गांव में गर्मी की वजह से सर्दी, जुखाम, बुखार, सिर दर्द जैसे भी स्वास्थ्य समस्या लोगों को है।, 

अंत में राकेश कहते हैं कि, ‘ग्रामीण स्तर पर पीने और नहाने के ठंडे पानी की कमी है। गांव में लोग मटके या घड़े में पानी भरते हैं। तब वे कुछ दिन तक ठंडा पानी देते हैं। उसके बाद घड़ों में ठंडा पानी नहीं होता। तब कई लोग बोतलों, बर्तनों पर मोटा कपड़ा बांध देते हैं फिर, बर्तन में पानी भरते हैं और कपड़ा गीला कर देते हैं ताकि, पानी ठंडा हो सके। ऐसे काम चलाना पड़ता है। गाँव फ्रिज, वाटर कूलर की सुविधा भी नहीं हैं।,  

मडै़यन गांव में हीट-वेव की स्थिति

कैमासन गाँव से जब हम बाइक से मडैयन गाँव जाते हैं तब करीब 30 मिनिट में मडै़यन पहुँचते हैं। यह गाँव भी मुख्य धारा से काटा हुआ गाँव हैं। जहां पहुँचने के लिए पहाड़ की  कच्ची सड़क से जाना पड़ता है। गाँव काफी पिछड़ा है। गाँव में अंदर जब हम जाते हैं तब हमें माया बाई गोंड (50) का घर मिलता है। घर पर हम माया बाई से मिलकर, गर्मी पर चर्चा शुरू करते हैं। तब वे कहती हैं कि, ‘गर्मी में सबसे ज्यादा पानी की समस्या है। नलों में पानी कम आ रहा है। 4 कुप्पा पानी भरने के लिए भी घंटों खड़ा रहना पड़ता है धूप में। एक तो नल चलाने में दम निकल जाता है ऊपर‌ से तेज धूप से चक्कर आने लगते हैं। जब धूप बर्दाश्त नहीं होती तब बर्तन नल के पास रखकर घर चले जाते हैं। फिर, छांव में आते पानी भरने।’

आगे वे बताती हैं कि, ‘गांव के आसपास आये दिन, पशु-पक्षी मृत मिल रहे हैं। कई पक्षी ज्यादा गर्मी, छाया और पानी की कमी के कारण मर रहे हैं। ऐसे ही गाय जैसे मवेशी भी बिना देखभाल के मर रहे हैं। इस सबका मुख्य कारण तेज धूप, गर्मी और खाना-पानी ना मिलना है।’

माया बाई के घर ही हमारी भेंट दीपेंद्र गोंड करीब 28 वर्ष से होती है। वे राजधानी दिल्ली में मजदूरी के लिए जाते हैं। मगर, वहां की गर्मी भोगकर वे गांव‌ वापिस आ गये हैं। वे कहते हैं कि,  ‘शहरों की आवास, बिजली, पानी, हवा जैसे सुविधाएं महंगी है। खुलेपन की कमीं है। धूल, धूप, गर्मी, प्रदुषण मुझे बीमार बना रहा था। इसलिए मैं गांव‌ आ गया। मगर, यहां भी गर्मी इतनी ज्यादा है इस बार कि, घरों में रहना मुश्किल हो रहा है। वहीं, मैं देख रहा हूं कि, इस गर्मी और प्रचंड धूम में बहुत से पेड़ भी सूख रहे हैं। साथ में पेड़ भी गर्म हवा छोड़ रहे हैं।,

दीपेन्द्र के बोल सुनने के बाद हम आगे बढ़ते हैं तब बांस के पेड़ों के पास हमें  सांवत गोंड (60) मिलते हैं। वे गर्मी के आलम पर कहते हैं कि, ‘गर्मी के कारण मैने पन्ना के अस्पतालों में देखा है कि,  मरीजों की भीड़ में बच्चे और बुजुर्ग ज्यादा शामिल हैं। गांव में गर्मी से लोग तब और‌ ज्यादा परेशान हो जाते हैं जब बिजली चली‌ जाती है। बरसात और ठंड के दिनों तो स्थिति यह होती है कि, लोग एक बार‌ रात में सो जाते हैं तो सुबह नींद खुलती है। मगर, गर्मी में एक तो नींद‌ लगती नहीं लगती है तो घंटे-घंटे पर खुल जाती है।, 

आगे वह एक घटना बताते हुए बोलते हैं कि, ‘हमारे पास के गांव लक्ष्मीपुरा में 3 लोग तेंदुपत्ता तोड़ने गये थे। जब वे पहाड़ से लौटे तब पानी खत्म हो गया। फिर, एक पेड़‌ के नीचे आराम के लिए बैठे‌। इसके बाद‌ उनकी बैठे-बैठे मौत हो गयी। जब उन लोगों का पोस्ट मार्टम किया गया, तब डॉक्टर ने पुष्टि की कि, अत्यधिक गर्मी का प्रेसर, पानी की कमीं और‌ धूप के कारण उनकी मौत हुई है।, 

सावंत गोंड से बात करने के बाद हम पहुँचते हैं ओंकार गोंड (38) के घर। वे हीट-वेव पर बताते हैं कि, ‘गांव में गर्मी की वजह से शांति है। दिन में लोग सिर्फ सुबह-शाम दिखते हैं।  बीच के समय कोई नहीं दिखता। वहीं, गर्मी से  किसी काम भी मन‌ नहीं लगता। रात के अलावा बहुत ज्यादा दिन में भी नींद आती है।,

ओंकार आगे कहते हैं कि, ‘अभी नौतपा के दिन भी लगे हुए हैं इसलिए भी गर्मी अत्यधिक है। गर्मी इतनी भयंकर है कि, जब पसीना‌ आता है तब एक ही बार में कपड़े गंदे हो जाते हैं। सर्ट-पेंट‌ पर पसीने के निशान साफ नजर‌ आने लगते हैं। इसलिए, रोज कपड़े बदलकर पहनना पड़ता है।, 

मनौर गांव में गर्मी का असर

इसेक बाद मडैयन को हम पीछे छोड़ निकल पड़ते हैं मनौर गाँव के लिए। करीब 20 मिनिट में हम बाइक से मनौर गाँव पहुँचते हैं। यह गाँव बिल्कुल पन्ना से सटा हुआ है। बावजूद विकास से महरूम हैं। गाँव में हम कई ग्रामीणों से मिलते हैं उनमे से एक छमियां गोंड‌ (50) भी होती हैं। वे हीट-वेव के मुद्दे पर कहती हैं कि, ‘गर्मी इतनी ज्यादा है कि, रिश्तेदारी सहित कहीं भी आने-जाने का मन नहीं कर रहा। यहाँ तक कि, लू के डर से पन्ना‌ में बाजार के लिए भी शाम को जाना पड़ता है और रात को आते हैं।  धूप इतनी खतरनाक है कि, दोपहर में जमीन या रोड पर नंगा पाव पड़‌ जाए तो ऐसा लगता है जैसे पैर आग में जल रहे हो।, 

छमियां आगे जाहिर करती हैं कि, ‘गर्मी के कारण स्थिति यह है कि सब्जी, फल-फूल जैसा कोई भी पौधा जमीन में लगाते तब पनप नहीं पाता। खूब पानी, खाद्य भी डालते हैं। लेकिन, आखिरकार गर्मी के प्रकोप से पौधा‌ मर‌ ही जाता है।,

आगे हम सुकरतन गोंड करीब (30) के घर भी पहुँचते हैं। उनका हाल-चाल पूछते हुए बातचीत शुरू करते हैं इस दौरान वे कहती हैं कि, ‘गर्मी से सबसे ज्यादा बच्चे परेशान हैं। वे दिन‌ में और रात में रोते रहते हैं। पंखा गर्म हवा देता है इसलिए बच्चों को गीला तौलिया, रूमाल हिलाकर हवा करनी पड़ती है। बिजली की भी दशा यह है कि, आती-जाती रहती है।,

आगे वह बोलती हैं कि, ‘गर्मी और धूप के कारण बच्चों सहित युवाओं व अन्य को सिर में गरमीला (बड़ी-बड़ी फोड़ा) भी हो रहे हैं। साथ में नाक से खून (नाकी) बहने की स्वास्थ्य समस्या भी सामने आ रही है।,

सुकरतन और हमारे बीच हो रहे संवाद को सुनकर राजकुमारी गोंड (33) भी हमारे पास चली  आती हैं। इस बीच हम देखते हैं कि, राजकुमारी की एक आँख बहुत लाल है और सूजन हैं। इस स्थिति में वे बताती हैं कि, ‘कड़कड़ाती धूप और गर्मी में परिवार का भरण-पोषण करने के लिए मेहनत-मजदूरी करते है इसलिए आंखों में जलन होने लगी है। दोनों आंखे लाल है। एक आंख भयंकर लाल है और फुन्सियां भी हैं। इसका इलाज भी करवाया है। धीरे-धीरे आराम होगा।,

राजकुमारी आगे व्यक्त करती हैं कि, ‘गाँव में आंखों की समस्या से मैं ही अकेली पीड़ित नहीं हूं। कई महिलाएं, पुरुष और बच्चों को गर्मी में आंखों के लालपन की परेशानी उठानी पड़ रही है। हजारों रूपए तो लोगों का आंखों के इलाज में समा गया है। डॉक्टर कहते हैं कि, अत्यधिक गर्मी का असर आंखों से निकल रहा है।,

इसके बाद हम गाँव आखिरी छोर पर पहुँचते हैं जहां कहानी के आखिरी किरदार 18 वर्षीय राजेन्द्र गोंड से हीट-वेव पर बात करते हैं। तब वे फरमाते हैं कि, ‘ग्रामीण स्तर पर आज भी गर्मी से निपटने के संसाधन जैसे, पंखा, कूलर, फ्रिज का अभाव है। जिसकी प्रमुख वजह है लोगों का ससाधनहीन या गरीब होना। वहीं, साथ में गर्मी के मौसम में कैसे रहन-सहन, खान-पान, यात्रा और सार्वजनिक जनजीवन में बदलाव लाएं की गर्मी, धूप का असर कम हो सके इसकी जागरूकता का ग्रामीण स्तर पर अभाव है।,

आगे राजेन्द्र कहते हैं कि, ‘मेरा मानना है कि शासन-प्रशासन को ग्रामीण स्तर पर गर्मी के मौसम में जागरूकता की पहल करना चाहिए। साथ समुदायिक स्तर पर ठंडे पानी, हवा, छाव अन्य सुविधाओं की व्यवस्था भी करनी चाहिए। ताकि, ग्रामीणों को हीट-वेव के दुष्परिणामों से बचाया जा सके।,  

स्वास्थ्य अधिकारी का नज़रिया

पन्ना जिला स्वास्थ्य विभाग के सीएमएचओ राजेश तिवारी से भी हमने पन्ना जिले में हीटवेव के मुद्दे पर बात की‌। इस दौरान वह कहते हैं कि, ‘हीटवेव के कारण मौत की रिपोर्ट अभी जिले में रिकार्ड नहीं की गयी है। हीटवेव से उल्टी, दस्त जैसी बीमारियों से निपटने के लिए वायरस, ओआरएस कार्नर बनाए गये।’

वह यह भी बताते हैं कि, ‘लू और गर्मी से बचाव हेतु एडवाइजरी भी जारी की गयी थी। ताकि, लोगों को जागरूक किया जा सके। वहीं, इस बार लगातार दस दिन हीट-वेव की स्थिति ज्यादा सामने आयी नहीं है। बीच-बीच में पानी भी गिरता रहा है और हवा चलती रही है, जिससे मौसम अनुकूल रहा है।’

सामाजिक कार्यकर्ता का विचार

पन्ना में पर्यावरण जैसे अन्य विषयों पर कार्य कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता ज्ञानेद्र तिवारी से हमने पन्ना के संदर्भ में हीट-वेव पर उनका नजरिया जानने की कोशिश की। उनसे हुयी बातचीत के कुछ अंश में वह कहते हैं कि, ‘आज जल, जंगल, जमीन और जीव-जंतुओं के साथ जो असंतुलन की स्थिति पैदा की जा रही है जिससे जलवायु परिवर्तन हो रहा है। ऐसे में पर्यावरण और जैव-विविधता में बुरा बदलाव आ रहा है। परिणामस्वरूप देश में हीट-वेव का संकट बढ़ रहा है।,

आगे वह कहते हैं कि, ‘पन्ना के संदर्भ में देखा जाये तब यहाँ के ग्रामीण इलाकों में खास तौर पर आदिवासी समुदाय काफी पिछड़ा और गरीब है। इसलिये हीट-वेव से पीड़ा की स्थिति उस वर्ग को ज़्यादा भोगनी पड़ रही है। हीट-वेव से उन्हें कई बीमारियां और समस्याएं झलेनी पड़ रही हैं। इन्हीं समस्याओं में से एक संकट उनकी आजीविका का है। अत्यधिक और असमय गर्मी से आदिवासी समुदाय के तेंदूपत्ता, आचार, महुआ, चरवा जैसे उत्पाद वाली अर्थव्यवस्था को भारी नुकान हुआ है। जिससे उनकी जीविका इस बार अधिक प्रभावित हुयी है। वहीं, उनके लिए हीट-वेव से बचाव के उपाय सुझाने की भी जरूरत है। इसके लिए प्रशासन को ध्यान देना चाहिए।,

मध्यप्रदेश में तापमान

मध्यप्रदेश में बीते दिनों छतरपुर जिले के खजुराहो और नौगांव राज्य के सबसे गर्म स्थान के रूप में रिकार्ड किये गये। जहां तापमान 46.6 से 47 डिग्री सेल्सियस के बीच दर्ज किया गया है। इसी इलाके से पन्ना की सीमा छूती है। ऐसे में पन्ना में प्रचंड गर्मी सामने आयी है। स्थिति यह रही है कि, नौतपो के वक्त मौसम विभाग द्वारा पन्ना जैसे जिले में रेड अलर्ट भी जारी किया गया है। हालांकि, पन्ना के अलावा छतरपुर, निवाड़ी, टीकमगढ़ जैसे जिलों में भी मौसम विभाग ने रेड अलर्ट जारी किया। इसके अलावा प्रदेश के 46 जिलों में लू का असर महसूस किया गया।

वहीं, पन्ना जैसे जिले में मई माह का तापमान देखें तब समझ आता है कि, मई माह में 11 मई से 28 मई के बीच रात का तापमान 24 डिग्री सेल्सियस से 31 डिग्री सेल्सियस तक हुआ। जो मई में सबसे ज्यादा रहा। इस बीच अधिकतम तापमान 31 डिग्री सेल्सियस तापमान 25 मई की रात को रिकार्ड किया गया। वहीं, हम मई माह में दिन का तापमान देखते हैं तब समझ आता है कि, मई माह में अधिकतम 11 मई से 28 मई के बीच दिन का तापमान 41 डिग्री सेल्सियस से लेकर 45 डिग्री सेल्सियस के बीच रहा है। ऐसे में कई दिनों 41, 42, 43 और 44 डिग्री सेल्सियस तक तापमान रहा है। जबकि, 19 व 20 मई को दिन का अधिकतम तापमान 45 डिग्री सेल्सियस रहा है। इस स्थिति में मौसम विभाग के मुताबिक, मैदानी इलाकों में अधिकतम तापमान 40 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक होने को हीट-वेव कहा जाता है। वहीं, तटीय इलाकों में 37 डिग्री सेल्सियस याकि, उससे ज्यादा होने पर और पहाड़ी इलाकों में 30 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक होने पर हीट-वेव माना जाता है।

हीट-वेव पर सरकारी एडवाइजरी   

देश के कई हिस्सों में तापमान में लगातार वृद्धि और सामान्य से अधिक गर्मी की स्थिति को देखते हुए बीते अप्रैल माह में भारतीय मौसम विज्ञान विभाग द्वारा दिशा निर्देश जारी करने की सलाह दी गयी। यह दिशा-निर्देश खास तौर पर लू के सम्बद्ध में थे। दिशा निर्देशों के तहत सीधे धूप में लंबे समय तक रहने से बचना, पर्याप्त मात्रा में पानी पीना, हल्के और हवादार कपड़े पहनना और उच्च तापमान के दौरान कठिन बाहरी गतिविधियों से बचने की जानकारी दी गयी। साथ में बच्चों, बुजुर्गों और पहले से अस्वस्थ्य व्यक्तियों को विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी गई है।

गर्मी से परेशान व्यक्तियों के लिए ठंडी छायादार जगह पर ले जाए। ठंडा पानी पिलाएं। उसे हवा की सुविधा दें। डॉक्टर की सलाह लें। नशे से दूर रखें। चेहरे पर ठंडा और गीला कपड़ा रखें। गर्मी की आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए पानी की बोतल, छाता, टोपी, तौलिया, ग्लूकोज पास रखें। जैसे विभिन्न उपाये सुझाए गए।    

दिशा-निर्देश में शिशु, गर्भवती महिलाएं, श्रमिको अतिरिक्त देखभाल की आवश्यकता बताई गयी। कार्यस्थलों, सार्वजनिक आयोजनों, बाहरी गतिविधियों के लिए विशेष सावधानी सुझायी गयी। जिसमें, छायादार विश्राम, स्थलों की व्यवस्था, नियमित जलपान, अवकाश, श्रमिकों के लिए अनुकूल उपाय कर प्रति जागरूकता बढ़ाना शामिल किया गया। वहीं, चक्कर आना, सिर दर्द, बेहोशी, शरीर का अत्यधिक तापमान होने पर सतर्कता की चेतावनी दी गयी। साथ में, हीटस्ट्रोक को एक चिकित्सा आपात स्थिति बताया गया और गंभीर मामलों में 108/102 आपातकालीन हेल्प लाइन पर संपर्क करने की सलाह दी गयी।        

इसके अलावा छाछ, नारियल पानी, नींबू पेय पीने। दैनिक आहार में तरबूज, नीबू, खरबूजा, लौकी, टमाटर शामिल करने की सलाह दी गयी। साथ में, हर्बल लेप लगाने के बारे में भी कहा गया।

सतीश भारतीय
सतीश भारतीय
सतीश भारतीय मध्यप्रदेश के एक स्वतंत्र पत्रकार हैं। वे मानवाधिकार, पर्यावरण, जीविका, स्वास्थ्य, भूमि और महिलाओं के मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हैं। वे संविधान, वाईस फैलोशिप का हिस्सा रह चुके हैं।
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