कांकेर/नारायणपुर। छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ के घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ियों के बीच बसे गुमचुर गांव में आज भी बुनियादी सुविधाएं लोगों की पहुंच से दूर हैं। महज पांच परिवारों और करीब 50 लोगों की आबादी वाला यह छोटा सा गांव स्वतंत्रता के दशकों बाद भी सड़क, स्वच्छ पेयजल, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा है।
गांव तक पहुंचने के लिए आज भी कोई पक्की सड़क नहीं है। ग्रामीण संकरी पगडंडियों और पथरीले पहाड़ी रास्तों के सहारे आवाजाही करते हैं। बरसात के मौसम में स्थिति और गंभीर हो जाती है, जब गांव का संपर्क बाहरी दुनिया से लगभग कट जाता है। रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भी लोगों को कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है।
गुमचुर की सबसे बड़ी समस्या पेयजल की है। गांव में न तो हैंडपंप है और न ही कोई स्थायी जलस्रोत। प्यास बुझाने के लिए ग्रामीण पास के नाले में झिरिया खोदकर रिसते पानी को इकट्ठा करते हैं। यही पानी पीने और घरेलू इस्तेमाल के काम आता है। पानी को कपड़े से छानकर इस्तेमाल करने के बावजूद संक्रामक बीमारियों का खतरा बना रहता है। छोटे-छोटे बच्चे भी सिर पर बर्तन रखकर जंगलों के बीच पानी ढोने को मजबूर हैं।
ग्रामीण असमी धुर्वा, शानिता मंडावी, सोमारी धुर्वा, लक्ष्मी धुर्वा, राजमू धुर्वा, विजय धुर्वा पटेल, लखमू और दन्नू बताते हैं कि गांव में न आंगनबाड़ी केंद्र संचालित है और न ही स्कूल की कोई व्यवस्था है। इसके कारण छोटे बच्चे शिक्षा से वंचित हैं। गर्भवती महिलाओं और बच्चों तक पूरक पोषण आहार भी नियमित रूप से नहीं पहुंच पाता, जिससे कुपोषण का खतरा बना हुआ है।
स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव भी ग्रामीणों के लिए गंभीर चिंता का विषय है। गांव में कोई उपस्वास्थ्य केंद्र या प्राथमिक चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं है। बीमारी की स्थिति में लोग पारंपरिक जड़ी-बूटियों के सहारे इलाज करने को मजबूर हैं। निकटतम स्वास्थ्य केंद्र ग्राम पंचायत मुख्यालय गारपा में स्थित है, जहां पहुंचने के लिए करीब पांच किलोमीटर का कठिन पहाड़ी रास्ता तय करना पड़ता है। आपात स्थिति में यही दूरी कई बार जिंदगी और मौत के बीच का फासला बन जाती है।
अबूझमाड़ के गुमचुर जैसे गांव यह सवाल खड़ा करते हैं कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी क्या देश के सभी नागरिक विकास की बुनियादी सुविधाओं तक समान रूप से पहुंच बना पाए हैं।


