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बस्तर की शादी की वह परम्परा, जहां मिट्टी, पेड़ और गीत बनते हैं रिश्ते के गवाह

“तुचो काजे चूड़ी गेनून देयूंदे रैला, .. काय काजे रिसासलीस रे रैला,

हल्बी भाषा में गाया जाने वाला यह पारम्परिक गीत बस्तर की विवाह परम्परा का अहम हिस्सा है। गांव की महिलाएं जब “रैला माटी” लेने जाती हैं, तब इसी तरह गीत गाकर रैला को मनाने की कोशिश करती हैं। गीतों में उसे चूड़ी, गहना और लड्डू देने का लालच दिया जाता है। महिलाएं रस्साकशी की तरह रैला को खींचते हुए घर लाती हैं। यह केवल एक रस्म नहीं, बल्कि बस्तर की जीवित लोक संस्कृति और सामुदायिक परम्परा का प्रतीक है।

छत्तीसगढ़ का बस्तर संभाग अपनी सांस्कृतिक विविधता और आदिवासी परम्पराओं के लिए जाना जाता है। यहां लगभग 60 प्रतिशत आबादी आदिवासी समुदाय की है, जिसमें मुरिया, गोंड, माड़िया, हल्बा और भतरा जैसी जनजातियां प्रमुख हैं। अलग-अलग समुदायों की विवाह परम्पराओं में भले कुछ अंतर हो, लेकिन प्रकृति और परम्परा से जुड़ाव सभी में समान दिखाई देता है। बस्तर में विवाह केवल दो लोगों का संबंध नहीं माना जाता, बल्कि प्रकृति, जल, मिट्टी और समुदाय को साक्षी मानकर इसे सम्पन्न कराया जाता है।

बस्तर के कुछ आदिवासी समुदाय के अलवा अन्य समुदाय में भी यह रस्म अदा की जाती है।इन्हीं परम्पराओं में “रैला माटी” की रस्म विशेष महत्व रखती है। छत्तीसगढ़ के अन्य इलाकों में इसे “चूल माटी” कहा जाता है, लेकिन बस्तर में यह “रैला माटी” के नाम से प्रसिद्ध है। वहीं चूल माटी और रैला माटी में थोड़ा रस्मों में अंतर है। मान्यता है कि विवाह से पहले रैला माटी और “सेमर राजा” का प्रतीकात्मक विवाह कराया जाता है। इसके बाद ही वर-वधू का विवाह सम्पन्न होता है। ग्रामीणों का विश्वास है कि जिस घर में यह रस्म निभाई जाती है, वहां वैवाहिक संबंध मजबूत और स्थायी बने रहते हैं।

स्थानीय जानकार राकेश बताते हैं कि रैला माटी लेने गांव की महिलाएं सामूहिक रूप से गांव की गुड़ी या देवस्थल जाती हैं। वहां गांव की पुजारिन सेवा-अर्जी करती है। मिट्टी खोदने से पहले कोयला और ईंट के चूर्ण से रंगोली बनाई जाती है। फिर सिंदूर, भोजन और महुआ शराब अर्पित की जाती है। इसके बाद नए कपड़े या तौलिये में मिट्टी बांधकर महिलाएं गीत गाते हुए उसे गांव तक लेकर आती हैं।

मान्यता है कि रैला सात बहनों में सबसे छोटी बहन होती है। इसलिए उसे मनाने के लिए महिलाएं पारम्परिक गीत गाती हैं। गीतों में कहा जाता है कि “तेरे लिए लड्डू खरीद देंगे, तेरे लिए माला लाएंगे।” यह पूरा आयोजन महिलाओं द्वारा ही सम्पन्न किया जाता है, जिसमें पुरुषों की भूमिका लगभग नहीं होती। मिट्टी लाने के बाद महिलाएं लाई, महुआ शराब और अब बदलते समय के साथ कोल्ड ड्रिंक भी आपस में बांटती हैं।रैला माटी की रस्म में बस्तर की सामूहिक संस्कृति साफ दिखाई देती है। महिलाएं पारम्परिक वेशभूषा में मोहरी और गाजे-बाजे के साथ गांव से निकलती हैं। विवाह वाले घर की भाभी या परिवार की महिलाएं विशेष रूप से इस रस्म में शामिल होती हैं। यह परम्परा विशेष रूप से बस्तर समुदाय में देखने को मिलती है, हालांकि आसपास की कई जनजातियों में भी इससे मिलती-जुलती रस्में निभाई जाती हैं।

शाम होते-होते “सेमर राजा” को लाया जाता है। सेमर की लकड़ी को विशेष आकृति देकर मंडप में स्थापित किया जाता है। इसे बांस की चटाई में रखकर हल्दी चढ़ाई जाती है। फिर नाचते-गाते हुए मंडप तक लाया जाता है। मंडप में सबसे पहले रैला माटी को गड्ढे में रखा जाता है और उसके ऊपर सेमर राजा को स्थापित किया जाता है। इसी के साथ रैला और सेमर राजा का प्रतीकात्मक विवाह सम्पन्न माना जाता है। इसके बाद वर-वधू के विवाह संस्कार आगे बढ़ते हैं।

बस्तर के ग्रामीण इलाकों में आज भी ऐसी परम्पराएं संस्कृति को जीवित बनाए हुए हैं। हालांकि आधुनिकता के प्रभाव के साथ अब आदिवासी समाज की कई पारम्परिक पहचानें धीरे-धीरे बदल रही हैं। आज भी कई आदिवासी समुदाय में भी अब सिंदूर और मंगलसूत्र जैसी बाहरी परम्पराएं देखने को मिलने लगी हैं। जिससे आदिवासियों की असली पहचान विप्लुप्त होने की कगार पर है.

थमीर कश्यप
थमीर कश्यप
थमीर कश्यप बस्तर, छत्तीसगढ़ के पत्रकार, डॉक्यूमेंट्री फोटोग्राफर और फिल्ममेकर हैं। वे आदिवासी संस्कृति, ग्रामीण जीवन, जंगल और बस्तर के जमीनी मुद्दों पर अपनी विशेष रिपोर्टिंग और विजुअल स्टोरीटेलिंग के लिए जाने जाते हैं। उनकी कहानियाँ बस्तर की परंपरा, संस्कृति और स्थानीय समुदायों की आवाज़ को प्रमुखता से सामने लाती हैं।
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